डॉ. धर्मवीर : जीवन, शिक्षा, आईएएस सेवा और साहित्यिक योगदान की पूरी कहानी
जन्म : 9 दिसंबर 1950, मेरठ के नंगला ताशी गाँव में
निधन : 9 मार्च 2017
सेवा : 1980 बैच, केरल कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी
शिक्षा : एम.ए., बी.एससी., पीएच.डी., एम.डी.पी.ए., एम.फिल., डी.लिट.
हिंदी साहित्य और दलित चिंतन के इतिहास में डॉ. धर्मवीर का नाम एक ऐसे लेखक और आलोचक के रूप में लिया जाता है जिसने स्थापित धारणाओं को स्वीकार करने के बजाय उनके पीछे छिपे सामाजिक, ऐतिहासिक और जातिगत आधारों को प्रश्नांकित किया. वे केवल साहित्य के अध्येता नहीं थे. वे प्रशासनिक अधिकारी भी थे, सामाजिक चिंतक भी, दलित विमर्श के आलोचक भी और कबीर, रैदास तथा आजीवक पर लंबे समय तक शोध करने वाले लेखक भी थे.
उनकी पहचान विशेष रूप से कबीर की पुनर्व्याख्या, संत रैदास के अध्ययन, डॉ. आंबेडकर के चिंतन, दलित आत्मालोचन और आजीवक दर्शन से जुड़ती है. उनके लेखन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे साहित्य को केवल साहित्यिक सौंदर्य की दृष्टि से नहीं देखते थे, बल्कि उसके पीछे काम कर रही सामाजिक सत्ता, जाति, धर्म और इतिहास की संरचनाओं को भी जांचते थे.
विभिन्न प्रकाशन के उपलब्ध लेखक-परिचय में उन्हें 9 दिसंबर 1950 को जन्मे और 1980 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी के रूप में दर्ज किया गया है. वहीं उनकी अनेक पुस्तकों की सूची भी दी गई है.
डॉ धर्मवीर की संघर्षपूर्ण सामाजिक पृष्ठभूमि
डॉ. धर्मवीर का जन्म मेरठ के नंगला ताशी गाँव में हुआ था और उनका बचपन कंकरखेड़ा में बीता. उनके पिता हंसाराम पढ़े-लिखे नहीं थे और शुरुआती जीवन में दर्जी का काम करते थे. बाद में उन्हें आर्मी वर्कशॉप में काम मिला. उपलब्ध जीवनीपरक सामग्री के अनुसार डॉ. धर्मवीर अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे.
यह पारिवारिक पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण है क्योंकि आगे चलकर धर्मवीर के चिंतन में शिक्षा, जाति, सामाजिक सम्मान और आत्मनिर्भरता के प्रश्न लगातार दिखाई देते हैं.
उनका जीवन इस अर्थ में भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने सीमित सामाजिक-सांस्कृतिक संसाधनों से निकलकर उच्च शिक्षा प्राप्त की और अंततः भारतीय प्रशासनिक सेवा तक पहुँचे. उपलब्ध स्रोत उनके बारे में बताते हैं कि पढ़ाई के बाद उन्होंने सिंडिकेट बैंक में लगभग पाँच वर्ष काम किया और कुछ समय मेरठ कॉलेज में अध्यापन भी किया. इसके बाद 1980 में वे आईएएस अधिकारी बने.
इस यात्रा को केवल व्यक्तिगत सफलता के रूप में देखना उनके जीवन को छोटा करके देखना होगा. यह उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों में शिक्षा और बौद्धिक निर्माण की एक महत्वपूर्ण यात्रा थी.
डॉ धर्मवीर की शिक्षा और बौद्धिक निर्माण
डॉ. धर्मवीर अत्यंत उच्च शिक्षित थे. प्रकाशक द्वारा उपलब्ध उनके परिचय में उनकी शैक्षिक योग्यताओं में एम.ए., बी.एससी., पीएच.डी., एम.डी.पी.ए., एम.फिल. और डी.लिट. का उल्लेख मिलता है. कुछ पुराने स्रोत डी.लिट्. को शोधरत/प्रस्तावित रूप में भी दर्ज करते हैं, इसलिए उनकी प्रत्येक डिग्री की अलग-अलग संस्थागत पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से करना कठिन है. पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि वे अपने दौर के शिक्षित व्यक्तियों में से एक थे और विशेष थे.
उनकी शिक्षा का प्रभाव उनके लेखन में साफ दिखाई देता है.
वे एक साथ—
- साहित्य पढ़ते थे,
- इतिहास की व्याख्या करते थे,
- समाजशास्त्रीय प्रश्न उठाते थे,
- प्रशासनिक व्यवस्था पर विचार करते थे,
- धर्म और दर्शन की पड़ताल करते थे,
- तथा दलित समाज के सामाजिक अनुभव को विमर्श के केंद्र में रखते थे.
यही कारण है कि उनकी किताबों को केवल दलित साहित्य या केवल हिंदी आलोचना की सीमा में रखना कठिन है.
डॉ धर्मवीर एक आईएएस अधिकारी के रूप में
1980 में डॉ. धर्मवीर केरल कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी बने. प्रकाशक के विवरण में उन्हें केरल सरकार के सचिवालय, तिरुवनंतपुरम से संबद्ध अधिकारी के रूप में दर्ज किया गया है. एक अन्य उपलब्ध परिचय में उन्हें सचिव और कमिश्नर, खाद्य एवं आपूर्ति विभाग, केरल सरकार के रूप में उल्लेखित किया गया है.
यह उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू है.
एक ओर वे सरकार के उच्च प्रशासनिक पद पर कार्य कर रहे थे और दूसरी ओर लगातार साहित्य, इतिहास और सामाजिक चिंतन पर लिख रहे थे.
इस दृष्टि से उनका जीवन प्रशासन और अकादमिक-बौद्धिक चिंतन के एक असामान्य मेल का उदाहरण था.
उनका लेखन नौकरी से अलग कोई छोटा-मोटा शौक नहीं था. उपलब्ध सामग्री से पता चलता है कि प्रशासनिक सेवा के दौरान भी वे निरंतर अध्ययन और शोध में लगे रहे.
डॉ. धर्मवीर का साहित्यिक व्यक्तित्व
डॉ. धर्मवीर की साहित्यिक यात्रा को मोटे तौर पर तीन बड़े चरणों में देखा जा सकता है—
पहला चरण — हिंदी साहित्य और आलोचना
इस दौर में उन्होंने हिंदी साहित्य, साहित्यकारों और साहित्यिक परंपराओं का अध्ययन किया.
दूसरा चरण — कबीर, रैदास और दलित चिंतन
इसके बाद उनका ध्यान कबीर, रैदास, आंबेडकर और दलित साहित्य की वैचारिक संरचना की ओर अधिक गहराई से गया.
तीसरा चरण — आजीवक चिंतन
जीवन के अंतिम दौर में उनका चिंतन आजीवक दर्शन और कबीर-रैदास-मक्खलि गोसाल के संबंध की खोज की ओर पहुँचा.
एक आलोचनात्मक आलेख के अनुसार कबीर पर उनका अध्ययन 1997 की ‘कबीर के आलोचक’ से शुरू होकर 2017 की ‘महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल’ तक लगभग दो दशकों में विकसित हुआ.
यही क्रम उनकी बौद्धिक यात्रा को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है.
लेखक की ‘हिन्दी की आत्मा’ से शुरुआत
उनकी आरंभिक चर्चित पुस्तकों में ‘हिन्दी की आत्मा’ महत्वपूर्ण है, जो 1989 के आसपास प्रकाशित हुई. इसके अलावा ‘लोकायती वैष्णव विष्णु प्रभाकर’ को भी उनके आरंभिक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कार्यों में गिना जाता है और यह कृति पुरस्कृत बताई गई है.
इस दौर में धर्मवीर मुख्यतः हिंदी साहित्य और उसके वैचारिक पक्षों के आलोचक के रूप में सामने आते हैं.
संत रैदास पर महत्वपूर्ण काम
डॉ. धर्मवीर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में ‘सन्त रैदास का निर्वर्ण सम्प्रदाय’ का विशेष स्थान है.
यह पुस्तक 1990 के आसपास प्रकाशित हुई और इसे पुरस्कृत कृति के रूप में दर्ज किया गया है.
रैदास पर उनका अध्ययन केवल भक्तिकालीन साहित्य के सामान्य अध्ययन तक सीमित नहीं था. वे रैदास के सामाजिक और वैचारिक पक्ष को सामने लाने की कोशिश करते हैं.
यहीं से उनके लेखन में एक ऐसी दिशा दिखाई देने लगती है जिसमें दलित संतों को केवल धार्मिक भक्ति-परंपरा का हिस्सा मानने के बजाय उनके स्वतंत्र सामाजिक और वैचारिक व्यक्तित्व के रूप में देखने का प्रयास किया गया.
कबीर : उनके चिंतन का सबसे बड़ा केंद्र
डॉ. धर्मवीर के साहित्यिक जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा शायद कबीर को समझने और उनकी प्रचलित व्याख्याओं को चुनौती देने में लगा.
कबीर पर उनकी पुस्तकों की एक पूरी श्रृंखला है—
- कबीर के आलोचक — 1997
- कबीर : बाज भी, कपोत भी, पपीहा भी — 2000
- कबीर और रामानन्द : किंवदन्तियाँ — 2000
- कबीर : डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का प्रक्षिप्त चिन्तन — 2000
- कबीर के कुछ और आलोचक — 2002
- कबीर : सूत न कपास — 2003
- कबीर : ‘खसम खुशी क्यों होय?’ — 2013
- महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल — 2017
उनका कबीर-अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने कबीर के बारे में प्रचलित साहित्यिक व्याख्याओं को स्वीकार करने के बजाय यह सवाल उठाया कि कबीर को इतिहास में किस तरह प्रस्तुत किया गया, किसने प्रस्तुत किया और किन धारणाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया.
‘कबीर के आलोचक’ में उन्होंने कबीर के प्रमुख आलोचकों की आलोचना की. पुस्तक की विषय-सूची में श्यामसुंदर दास, रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, परशुराम चतुर्वेदी और रामनिवास चंडक जैसे आलोचकों पर अलग-अलग अध्याय हैं.
यानी धर्मवीर के लिए कबीर का अध्ययन केवल कबीर की कविताओं को समझने का विषय नहीं था; वह कबीर की व्याख्या करने वाली पूरी साहित्यिक परंपरा की जांच भी था.
रामानंद और कबीर का प्रश्न
कबीर के गुरु के रूप में रामानंद को लेकर स्थापित परंपरा को भी धर्मवीर ने चुनौती दी. उनकी पुस्तक ‘कबीर और रामानन्द : किंवदन्तियाँ’ इसी प्रश्न से जुड़ी है.
धर्मवीर के कबीर संबंधी आलोचनात्मक कार्य पर लिखे गए एक लेख में बताया गया है कि उन्होंने कबीर के रामानंद से संबंध को ऐतिहासिक प्रमाण की बजाय किंवदंती के रूप में देखने की कोशिश की.
यह दृष्टिकोण हिंदी साहित्य में विवादास्पद भी रहा, लेकिन यही धर्मवीर की आलोचना की विशेषता थी—वे प्रचलित निष्कर्ष को अंतिम सत्य मानकर नहीं चलते थे.
‘दलित चिन्तन का विकास’ : एक वैचारिक मोड़
2007 में प्रकाशित ‘दलित चिन्तन का विकास : अभिशप्त चिन्तन से इतिहास चिन्तन की ओर’ उनकी वैचारिक यात्रा की अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है.
वाणी प्रकाशन के विवरण में कहा गया है कि धर्मवीर दलित प्रश्न को अनेक कोणों से देखने का प्रयास करते हैं और साहित्य, इतिहास तथा समाजशास्त्र—तीनों को अपने अध्ययन में शामिल करते हैं.
इस पुस्तक का केंद्रीय प्रश्न यह है कि दलित चिंतन की स्वतंत्रता आखिर किस प्रकार संभव हो सकती है.
डॉ धर्मवीर का तर्क था कि यदि दलित चिंतन लगातार अपने विरोधी सामाजिक वर्ग के संदर्भ में ही स्वयं को परिभाषित करता रहेगा, तो उसकी अपनी स्वतंत्र वैचारिक पहचान विकसित नहीं हो पाएगी. इसी कारण उन्होंने दलित चिंतन को अपने इतिहास, अपने महापुरुषों, अपने अनुभव और अपने ज्ञान-स्रोतों की ओर मोड़ने पर जोर दिया.
यहीं से धर्मवीर की आलोचना धीरे-धीरे दलित आत्मचिंतन की ओर बढ़ती दिखाई देती है.
डॉ धर्मवीर का दलित आत्मालोचन
डॉ धर्मवीर की एक महत्वपूर्ण अवधारणा थी—दलित समाज को केवल दूसरों की आलोचना नहीं करनी चाहिए, बल्कि स्वयं का भी आलोचनात्मक मूल्यांकन करना चाहिए.
इसी विचार से जुड़ी उनकी पुस्तक है—
‘दलित आत्मालोचन की प्रक्रिया’
उनका मानना था कि किसी भी समाज का बौद्धिक विकास केवल बाहरी शत्रुओं की पहचान करने से नहीं होता. उसे अपनी कमजोरियों, भ्रमों, राजनीतिक असफलताओं और वैचारिक सीमाओं पर भी विचार करना पड़ता है.
यह पहलू डॉ धर्मवीर को सामान्य प्रतिक्रियावादी लेखन से अलग करता है.
बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर पर डॉ धर्मवीर का चिंतन
डॉ. धर्मवीर ने बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर पर भी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं.
इनमें प्रमुख हैं—
- डॉ. अम्बेडकर और दलित आन्दोलन
- डॉ. अम्बेडकर की प्रभाववादी व्याख्या
- बालक अम्बेडकर
- डॉ. अम्बेडकर के प्रशासनिक विचार
- थेरीगाथा की स्त्रियाँ और डॉ. अम्बेडकर
उनकी पुस्तक ‘डॉ. अम्बेडकर के प्रशासनिक विचार’ विशेष रूप से उनके प्रशासनिक अनुभव और आंबेडकर-अध्ययन के मेल को दर्शाती है. प्रकाशक के रिकॉर्ड में यह 2004 की कृति के रूप में दर्ज है.
एक आईएएस अधिकारी होने के कारण प्रशासन, राज्य और सामाजिक न्याय के प्रश्न उनके लिए केवल सैद्धांतिक विषय नहीं थे. इसलिए आंबेडकर के प्रशासन संबंधी विचारों को पढ़ने की उनकी दृष्टि भी विशेष महत्व रखती है.
प्रेमचंद की पुनर्व्याख्या
डॉ धर्मवीर ने हिंदी के प्रसिद्ध लेखक प्रेमचंद को भी आलोचनात्मक दृष्टि से देखा.
उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं—
‘प्रेमचन्द : सामन्त का मुंशी’ — 2005
और
‘प्रेमचन्द की नीली आँखें’ — 2010
इन शीर्षकों से ही स्पष्ट है कि डॉ धर्मवीर ने प्रेमचंद की सामान्य प्रशंसात्मक छवि से अलग जाकर उनके साहित्य की सामाजिक और जातिगत संरचना की पड़ताल करने की कोशिश की.
‘प्रेमचन्द की नीली आँखें’ के बारे में उपलब्ध प्रकाशकीय सामग्री इसे डॉ धर्मवीर की महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल करती है.
उनका उद्देश्य केवल प्रेमचंद को खारिज करना नहीं था; वे यह पूछना चाहते थे कि हिंदी साहित्य में स्थापित लेखकों को किस सामाजिक दृष्टि से पढ़ा गया है और दलित अनुभव उस साहित्यिक मूल्यांकन में कहाँ मौजूद है.
‘जूठन’ का लेखक कौन है?
दलित साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने ‘जूठन’ का लेखक कौन है? नाम से भी पुस्तक लिखी.
यह शीर्षक सीधे-सीधे प्रसिद्ध दलित आत्मकथा ‘जूठन’ और उसके लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि से जुड़े प्रश्नों की ओर संकेत करता है.
इस तरह डॉ धर्मवीर ने दलित साहित्य के भीतर भी लेखकत्व, अनुभव, प्रतिनिधित्व और साहित्यिक अधिकार जैसे सवाल उठाए.
यह उनके चिंतन की एक विशेषता थी—वे केवल मुख्यधारा के साहित्य की आलोचना नहीं करते थे; वे दलित साहित्य के भीतर भी आत्मालोचन की आवश्यकता देखते थे.
‘कामसूत्र की सन्तानें’ और सामाजिक आलोचना
2005 में प्रकाशित ‘कामसूत्र की सन्तानें’ उनकी अपेक्षाकृत तीखी और विवाद पैदा करने वाली पुस्तकों में रही.
इस प्रकार की रचनाओं में धर्मवीर भारतीय समाज की यौन-सत्ता, परिवार, जाति, पितृसत्ता और सामाजिक नैतिकता जैसे प्रश्नों को अपने विशिष्ट आलोचनात्मक अंदाज में देखते हैं.
उनकी भाषा अक्सर सीधी, आक्रामक और असुविधाजनक होती थी. वे ऐसे शब्द और प्रश्न इस्तेमाल करने से भी नहीं बचते थे जिनसे स्थापित साहित्यिक या सामाजिक मान्यताओं को चुनौती मिले.
इसी कारण उनके समर्थक उन्हें निर्भीक और मौलिक आलोचक मानते हैं, जबकि आलोचक कई बार उनके निष्कर्षों और पद्धति से असहमत रहे हैं.
‘तीन द्विज हिन्दू स्त्रीलिंगों का चिन्तन’
2007 में प्रकाशित ‘तीन द्विज हिन्दू स्त्रीलिंगों का चिन्तन’ भी उनके सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन का हिस्सा है.
इस तरह की रचनाओं से स्पष्ट होता है कि डॉ धर्मवीर का अध्ययन केवल जाति तक सीमित नहीं था. वे जाति, लिंग, परिवार, धर्म, साहित्य और सत्ता के बीच संबंधों को भी देखने की कोशिश करते थे.
‘दूसरों की जूतियाँ’
उनकी चर्चित पुस्तकों में ‘दूसरों की जूतियाँ’ भी शामिल है.
यह शीर्षक भी डॉ धर्मवीर की आलोचनात्मक भाषा की विशेषता को सामने लाता है—वे सामाजिक व्यवहार और बौद्धिक अनुकरण को रूपकात्मक और तीखे ढंग से प्रस्तुत करते थे.
2007 की उनकी पुस्तकों के समूह में इसे भी दर्ज किया गया है.
‘चमार की बेटी रूपा’
उनकी रचना ‘चमार की बेटी रूपा’ दलित समाज, जाति और स्त्री के प्रश्नों से जुड़ी पुस्तक है.
उपलब्ध पुस्तक-सामग्री में इसके कथ्य के संबंध में यह विचार सामने आता है कि दलित स्त्रियों के सामने अपनी सामाजिक समुदाय के भीतर सम्मान और मजबूती का प्रश्न महत्वपूर्ण है. यह पुस्तक डॉ धर्मवीर के उस व्यापक चिंतन का हिस्सा है जिसमें वे दलित समाज के भीतर आत्मसम्मान, सामाजिक संगठन और अपनी स्वतंत्र पहचान को महत्वपूर्ण मानते हैं.
‘दलित सिविल कानून’
डॉ धर्मवीर का चिंतन केवल साहित्यिक या दार्शनिक नहीं था. उन्होंने सामाजिक जीवन के लिए वैकल्पिक कानूनी ढाँचे पर भी विचार किया.
इसी दिशा में उनकी पुस्तक ‘दलित सिविल कानून’ महत्वपूर्ण है.
यहाँ उनका प्रशासनिक अनुभव और सामाजिक चिंतन एक-दूसरे से जुड़ता दिखाई देता है.
वे केवल यह नहीं पूछते कि समाज में अन्याय क्यों है; वे यह प्रश्न भी उठाते हैं कि सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए वैकल्पिक संस्थाएँ और नियम कैसे हो सकते हैं.
आजीवक चिंतन की ओर यात्रा
डॉ. धर्मवीर के जीवन के अंतिम वर्षों को समझने के लिए आजीवक चिंतन को समझना जरूरी है.
उनकी अंतिम महत्वपूर्ण कृतियों में से एक है—
‘महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल’
यह पुस्तक 2017 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई. उपलब्ध पुस्तकालय रिकॉर्ड के अनुसार इसका पहला संस्करण 2017 में आया और पुस्तक लगभग 536 पृष्ठों की है. इस पुस्तक में डॉ धर्मवीर ने मक्खलि गोसाल, संत रैदास और कबीर को एक व्यापक आजीवक वैचारिक परंपरा के संदर्भ में देखने की कोशिश की.
उनके अनुसार संत कबीर और संत रैदास को केवल मध्यकालीन भक्ति परंपरा के संतों के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है; उनके पीछे एक अलग सामाजिक-दार्शनिक परंपरा की खोज की जानी चाहिए.
इसी शोध-यात्रा में मक्खलि गोसाल और आजीवक दर्शन उनके चिंतन के केंद्र में आते हैं.
आजीवक : डॉ धर्मवीर के चिंतन का अंतिम पड़ाव
डॉ धर्मवीर के समर्थकों और उनके चिंतन पर लिखने वाले लोगों के अनुसार उनकी बौद्धिक यात्रा का अंतिम चरण आजीवक दर्शन की पुनर्खोज था.
उनकी अंतिम पुस्तक को लेकर एक आलोचनात्मक अध्ययन में कहा गया है कि कबीर पर लगभग बीस वर्ष के अध्ययन के बाद डॉ धर्मवीर ने कबीर, रैदास और मक्खलि गोसाल को एक साझा आजीवक परंपरा में देखने का प्रयास किया.
हालाँकि यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है.
डॉ धर्मवीर की आजीवक संबंधी व्याख्या सर्वमान्य ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं है. इस विषय पर उनके विचारों के समर्थन में भी लेख लिखे गए और उनके निष्कर्षों की आलोचना भी हुई. उदाहरण के लिए, कुछ आलोचकों ने यह प्रश्न उठाया कि प्राचीन आजीवक परंपरा और डॉ धर्मवीर द्वारा प्रस्तुत आधुनिक व्याख्या के बीच कितना ऐतिहासिक अंतर है.
इसलिए डॉ धर्मवीर के आजीवक चिंतन को समझते समय उसे उनकी मौलिक वैचारिक स्थापना के रूप में देखना अधिक उचित है, न कि बिना बहस के स्थापित इतिहास के रूप में.
डॉ धर्मवीर की आलोचना का मूल स्वभाव
डॉ धर्मवीर की आलोचना को समझने के लिए उनके लेखन की कुछ प्रमुख विशेषताएँ सामने रखी जा सकती हैं.
1. स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न
वे किसी मान्यता को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करते थे कि वह लंबे समय से चली आ रही है.
2. दलित दृष्टि
उनका प्रयास था कि भारतीय इतिहास और साहित्य को दलित अनुभव के दृष्टिकोण से भी पढ़ा जाए.
3. आत्मालोचन
वे दलित समाज को केवल बाहरी शक्तियों की आलोचना करने के बजाय अपने भीतर भी आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करने की बात करते थे.
4. इतिहास की पुनर्पाठ
कबीर, रैदास और आजीवक पर उनका अध्ययन इसी पुनर्पाठ की कोशिश था.
5. साहित्य और सत्ता का संबंध
उनके लिए साहित्य केवल सौंदर्य नहीं था. साहित्य के पीछे सामाजिक सत्ता और वैचारिक संरचना भी काम करती है.
वे इतने विवादास्पद क्यों रहे?
डॉ. धर्मवीर को समझने का एक रास्ता यह भी है कि उन्हें केवल प्रशंसात्मक दृष्टि से न पढ़ा जाए.
उनकी भाषा कई बार बेहद तीखी होती थी. वे हिंदी साहित्य के बड़े नामों, स्थापित आलोचकों और प्रचलित धार्मिक-सामाजिक धारणाओं पर सीधे सवाल उठाते थे.
उनकी कबीर संबंधी पुस्तकों में रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे बड़े आलोचकों की आलोचना इसका उदाहरण है.
इसी तरह प्रेमचंद, दलित साहित्य, आंबेडकर की व्याख्या और आजीवक दर्शन को लेकर भी उनके निष्कर्षों ने बहस पैदा की.
इसलिए डॉ धर्मवीर के बारे में दो अतियों से बचना चाहिए—
एक, उन्हें निर्विवाद अंतिम सत्य का चिंतक मान लेना.
दूसरा, केवल विवादों के कारण उनके पूरे बौद्धिक योगदान को खारिज कर देना.
उनका महत्व इस बात में है कि उन्होंने ऐसे प्रश्न उठाए जिन पर बहस आवश्यक थी. या कहें कि आज भी प्रासंगिक हैं?
उनकी प्रमुख पुस्तकों की विस्तृत सूची
उपलब्ध प्रकाशकीय और पुस्तक-सूची स्रोतों को मिलाने पर डॉ. धर्मवीर की प्रमुख कृतियों का व्यापक क्रम इस प्रकार सामने आता है.
| वर्ष | पुस्तक |
|---|---|
| 1987 | लोकायती वैष्णव विष्णु प्रभाकर — पुरस्कृत |
| 1989 | हिन्दी की आत्मा |
| 1990 | सन्त रैदास का निर्वर्ण सम्प्रदाय — पुरस्कृत |
| 1990 | डॉ. अम्बेडकर और दलित आन्दोलन |
| 1990 | डॉ. अम्बेडकर की प्रभाववादी व्याख्या |
| 1990 | बालक अम्बेडकर |
| 1997 | कबीर के आलोचक |
| 2000 | कबीर और रामानन्द : किंवदन्तियाँ |
| 2000 | कबीर : बाज भी, कपोत भी, पपीहा भी |
| 2000 | कबीर : डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का प्रक्षिप्त चिन्तन |
| 2002 | कबीर के कुछ और आलोचक |
| 2003 | कबीर : सूत न कपास |
| 2004 | डॉ. अम्बेडकर के प्रशासनिक विचार |
| 2004 | अशोक बनाम वाजपेयी : अशोक वाजपेयी |
| 2004 | सीमन्तनी उपदेश — संपादित |
| 2005 | प्रेमचन्द : सामन्त का मुंशी |
| 2005 | कामसूत्र की सन्तानें |
| 2005 | थेरीगाथा की स्त्रियाँ और डॉ. अम्बेडकर |
| 2006 | ‘जूठन’ का लेखक कौन है? |
| 2007 | दलित चिन्तन का विकास |
| 2007 | दलित आत्मालोचन की प्रक्रिया |
| 2007 | दूसरों की जूतियाँ |
| 2007 | तीन द्विज हिन्दू स्त्रीलिंगों का चिन्तन |
| 2007 | चमार की बेटी रूपा |
| 2007 | दलित सिविल कानून |
| 2009 | मेरी पत्नी और भेड़िया |
| 2010 | प्रेमचन्द की नीली आँखें |
| 2013 | कबीर : ‘खसम खुशी क्यों होय?’ |
| 2014 | बालक श्यौराज : महा शिलाखंडों का संग्राम |
| 2017 | महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल |
प्रकाशक की वर्तमान पुस्तक-सूची में इनमें से अनेक शीर्षक आज भी सूचीबद्ध हैं.
पुरस्कार और साहित्यिक उपलब्धियाँ
उपलब्ध स्रोतों में उनकी कम-से-कम दो कृतियों को स्पष्ट रूप से पुरस्कृत बताया गया है—
- सन्त रैदास का निर्वर्ण सम्प्रदाय
- लोकायती वैष्णव विष्णु प्रभाकर
हालाँकि प्राप्त जानकारी में पुरस्कारों के नाम, वर्ष और संस्थाओं का विस्तृत आधिकारिक रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध नहीं मिल पाया. इसलिए उनके नाम से ऐसे पुरस्कार जोड़ना उचित नहीं होगा जिनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है.
एक साथ प्रशासक और आलोचक
डॉ. धर्मवीर का सबसे असामान्य पक्ष शायद यही था कि वे एक ओर आईएएस अधिकारी थे और दूसरी ओर हिंदी के अत्यंत सक्रिय और विवादास्पद आलोचक.
उनकी सरकारी सेवा ने उन्हें प्रशासनिक व्यवस्था को भीतर से देखने का अवसर दिया.
इसीलिए उनके लेखन में राज्य, कानून, प्रशासन और सामाजिक न्याय के प्रश्न बार-बार दिखाई देते हैं.
‘डॉ. अम्बेडकर के प्रशासनिक विचार’ इसका सबसे सीधा उदाहरण है.
दूसरी ओर उनका साहित्यिक लेखन बताता है कि उन्होंने अपनी सरकारी भूमिका को अपनी बौद्धिक पहचान पर हावी नहीं होने दिया.
डॉ धर्मवीर का निजी जीवन और अंतिम समय
उनके निजी जीवन के बारे में बहुत अधिक विश्वसनीय जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. इसलिए पत्नी, बच्चों, पारिवारिक जीवन या निजी संबंधों के बारे में उपलब्ध असंगत दावों को उनकी प्रमाणित जीवनी का हिस्सा बनाना उचित नहीं होगा.
इतना स्पष्ट रूप से उपलब्ध है कि उन्होंने जीवन के अंतिम वर्षों तक लेखन और शोध जारी रखा. उनकी अंतिम प्रमुख कृति ‘महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल’ 2017 में प्रकाशित हुई.
और इसके कुछ ही समय बाद—
9 मार्च 2017 को डॉ. धर्मवीर का निधन हो गया.
इस तरह उनका अंतिम प्रकाशित वैचारिक पड़ाव और उनका जीवन-अंत लगभग एक ही समय में आया.
डॉ. धर्मवीर को कैसे समझें?
डॉ. धर्मवीर को केवल ‘दलित लेखक’ कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा.
वे एक साथ—
- आईएएस अधिकारी थे
- हिंदी आलोचक थे
- दलित चिंतक थे
- आंबेडकर अध्येता थे
- कबीर के आलोचक और पुनर्व्याख्याकार थे
- रैदास के अध्येता थे
- इतिहास और धर्म-दर्शन पर शोध करने वाले लेखक थे
- और जीवन के अंतिम चरण में आजीवक चिंतन के प्रमुख आधुनिक व्याख्याकार बने
उनकी बौद्धिक यात्रा को अगर एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है—
डॉ धर्मवीर का लेखन स्थापित व्याख्याओं को दोहराने के बजाय यह पूछने की कोशिश है कि इतिहास, साहित्य, धर्म और समाज को दलित अनुभव की स्वतंत्र दृष्टि से कैसे पढ़ा जा सकता है.
उनकी सबसे बड़ी विरासत
डॉ. धर्मवीर की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद उनकी कोई एक पुस्तक नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की उनकी शैली है.
उन्होंने पूछा—
कबीर को हम वास्तव में कितना जानते हैं?
कबीर की व्याख्या किसने की और किस दृष्टि से की?
रामानंद और कबीर के संबंध का आधार क्या है?
रैदास को केवल भक्त कवि बनाकर देखने से क्या छूट जाता है?
दलित चिंतन कब स्वतंत्र होगा?
क्या दलित समाज को केवल दूसरों की आलोचना करनी चाहिए या स्वयं की भी?
बाबासाहेब डॉ आंबेडकर के प्रशासनिक विचारों को पर्याप्त महत्व क्यों नहीं दिया जाता?
इतिहास में दबे हुए गैर-ब्राह्मण और गैर-द्विज वैचारिक स्रोतों को फिर से कैसे खोजा जाए?
और अंततः—
क्या कबीर और रैदास को आजीवक परंपरा के संदर्भ में नए सिरे से पढ़ा जा सकता है?
इन प्रश्नों में से हर प्रश्न का उत्तर उनसे सहमत होकर देना आवश्यक नहीं है. लेकिन इन प्रश्नों को गंभीरता से लेना उनके बौद्धिक योगदान को समझने के लिए जरूरी है.
निष्कर्ष
डॉ. धर्मवीर का जीवन लगभग 66 वर्षों का था, लेकिन उनका लेखन-क्षेत्र उससे कहीं बड़ा है.
मेरठ के एक साधारण सामाजिक परिवेश से निकलकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना, सिंडिकेट बैंक और अध्यापन से होते हुए 1980 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी बनना और साथ-साथ हिंदी साहित्य, दलित चिंतन, बाबासाहेब आंबेडकर, संत कबीर, संत रैदास, प्रेमचंद और आजीवक दर्शन पर लगातार लिखते रहना—यह अपने आप में असाधारण बौद्धिक यात्रा है.
उनकी लगभग तीन दशकों से अधिक की प्रकाशित बौद्धिक यात्रा में विषय लगातार बदलते दिखाई देते हैं, लेकिन एक केंद्रीय प्रश्न बना रहता है—
सामाजिक रूप से दबे हुए मनुष्य को अपने इतिहास, अपने विचार और अपनी स्वतंत्र बौद्धिक पहचान की खोज कैसे करनी चाहिए?
‘सन्त रैदास का निर्वर्ण सम्प्रदाय’ से लेकर ‘कबीर के आलोचक’, ‘दलित चिन्तन का विकास’, ‘डॉ. अम्बेडकर के प्रशासनिक विचार’, ‘प्रेमचन्द : सामन्त का मुंशी’ और अंततः ‘महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल’ तक उनकी यात्रा इसी खोज का विस्तार दिखाई देती है.
उनकी सभी स्थापनाओं से सहमत होना जरूरी नहीं है. बल्कि उन्हें पढ़ने का बेहतर तरीका यही है कि उनके तर्क, उनके स्रोत और उनके निष्कर्षों को अलग-अलग परखा जाए. यही आलोचनात्मक परंपरा का सम्मान भी है.
9 मार्च 2017 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी किताबें आज भी उपलब्ध हैं और कबीर, रैदास, आंबेडकर, दलित साहित्य तथा आजीवक चिंतन को लेकर बहस में उनका नाम लगातार सामने आता है.
डॉ. धर्मवीर की सबसे बड़ी पहचान शायद यही है—वे ऐसे लेखक थे जिनसे सहमत होना आसान नहीं था, लेकिन जिन्हें नजरअंदाज करना भी आसान नहीं था।
डॉ धर्मवीर पर लिखे गए इस लेख को लिखते समय बहुत सावधानी बरती गई है और विभिन्न स्रोतों से जानकारी को मिलाया गया है. फिर भी इस लेख में तथ्यात्मक त्रुटी संभव है. पाठकगण इस बात का अवश्य ध्यान रखें – जी पी गौतम (लेख संपादक).


