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साहित्य

कविता: मगर मरे नहीं हैं हम… हारे हैं जरूर – सूरज कुमार बौद्ध की कविता

मगर मरे नहीं हैं हम। उनसे कह दो कि डरे नहीं है हम,हारे हैं जरूर मगर मरे नहीं हैं हम। बहुत जुनून है मुझमें नाइंसाफी के...

कविता: बेपर्दा प्रगतिशीलता– सूरज कुमार बौद्ध की कविता

जाति धर्म के मलबे में धंसा वो सच हैजो झूठ के हर पर्दे को बेपर्दा कर देता है.लोग कितने भी प्रगतिशील हों,गला फाड़कर लिबरल...

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