आज भी देश में अगर दलितों की स्थिति पर नजर डाली जाए तो उनकी स्थिति दयनीय बनी हुई है. मौजूदा वक्त में तो इसे और भी बदतर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि दलित पराश्रित बना रहे. वैसे भी युग युगांतर से दलितों को हेय दृष्टि से ही देखा गया है.
बाबासाहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान में समानता का जो अधिकार दिया है, उसकी धज्जियां उड़ाते हुए दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार व उत्पीड़न की घटनाएं आज भी जारी हैं. इसे लेकर समय-समय पर विमर्श और चिंतन भी हुआ है कि दलितों के साथ अनदेखी क्यों?
दलितों को मुख्य धारा में लाने के बजाय उनकी अनदेखी को लेकर सन 2000 में भी एक बहस छिड़ी थी. तब यूपी में भाजपा की सरकार के दौरान राज्यपाल सूरजभान ने दलितों के हितों की अनदेखी होने पर नाराजगी प्रकट की थी.
भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के शासन काल में दलितों को समानता का अधिकार न मिलने पर सूरजभान ने 12 व 13 जुलाई सन 2000 को हुए राज्यपाल सम्मेलन में भाजपा सरकार द्वारा दलितों की कल्याणकारी योजनाओं की अनदेखी किए जाने का मामला उठाया था. उन्होंने कहा था कि उत्तर प्रदेश में दलितों का हाल बुरा है. भाजपा सरकार आते ही दलितों से जुड़ी योजनाओं व कानूनों में फेरबदल किया गया है. दलित होने के नाते राज्यपाल सूरजभान ने अपनी ही सरकार के दलित विरोधी कारनामों का कच्चा चिट्ठा खोल दिया था.
राज्यपाल सूरजभान द्वारा उठाए गए इस गंभीर मुद्दे पर राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी खेद व्यक्त किया और इसे गंभीरता से लेते हुए महाराष्ट्र के राज्यपाल डॉक्टर पीसी अलेक्जेंडर की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी, जिसके सदस्य सूरजभान सहित हरियाणा, कर्नाटक, केरल, उड़ीसा, मिजोरम और मेघालय के राज्यपाल बने थे. सभी राज्यपालों ने 8 सितंबर 2000 को मुंबई में पहली बैठक की थी. इस समिति का गठन अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लिए अभिप्रेत कल्याणकारी कार्यक्रमों पर उनके विचार व चिंतन को रिकॉर्ड करने के लिए किया गया था.
क्योंकि आरक्षण की नीति के रहते भी दलितों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. तब मांग उठी थी कि अदालत में भी आरक्षण होना चाहिए. उसके लिए ऑल इंडिया ज्यूडिशल सर्विस के तहत ऐसे न्यायाधीश का गठन हो ताकि सेशन कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक दलित न्यायाधीश बैठे, ताकि दलितों के साथ नाइंसाफी न हो.
उसके बाद दलित राज्यपाल सूरजभान की यह बात भाजपा को इतनी बुरी लगी कि उन्हें उत्तर प्रदेश से हटाकर हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य का राज्यपाल बना दिया गया. इतना ही नहीं आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उनके बेटे को भी टिकट नहीं दिया था.
अगर उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो बसपा की मायावती सरकार के अलावा दलितों की खैर खबर लेने वाला कोई नहीं है. बहनजी की सरकार में पुराने पुलिसकर्मी नए पुलिस कर्मियों को समझाते थे कि अगर थाने में किसी दलित की आंख से एक आंसू भी टपक गया तो पूरे थाने के लेने के देने पड़ जायेंगे .
बीएसपी की चार बार की सत्ता में दलितों में उम्मीद से बढ़कर जागृति आई. उसके बाद दलितों ने बीएसपी के ही खिलाफ नए-नए संगठन और दल बनाकर विरोधियों की दरी बिछाना शुरू कर दिया. परिणाम स्वरुप बीएसपी कमजोर हुई और सत्ता में नहीं आ सकी. बीएसपी की सत्ता के बगैर दलितों की पिटाई, कुटाई और लुटाई जारी है.
(लेखक: मुरारी लाल भारती, ये लेखक के अपने विचार हैं)

