लखनऊ। UPI के जरिए होने वाले डिजिटल लेनदेन पर 15 अक्टूबर से लागू होने वाली नई शुल्क व्यवस्था को लेकर बसपा प्रमुख मायावती बहनजी ने सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा कि पहले UPI डिजिटल लेनदेन को तेजी से बढ़ावा देने के बाद अब उस पर शुल्क लगाने की व्यवस्था से आम जनता के बीच बेचैनी और आक्रोश स्वाभाविक है.
मायावती बहनजी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि प्रथमदृष्टया यह व्यवस्था उन्हें “मुनाफाख़ोरी के पूंजीवादी रवैये” के तहत जनता से आर्थिक बोझ वसूलने जैसी प्रतीत होती है. उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को चाहे कोई भी नाम दिया जाए, इसका असर अंततः आम जनता के जेब पर ही पडने वाला है.
15 अक्टूबर से क्या बदलेगा?
नई व्यवस्था के तहत कुछ पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) UPI लेनदेन पर Merchant Discount Rate यानी MDR लागू होगा. 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ व्यापारी लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR निर्धारित किया गया है. यह शुल्क व्यापारी-पक्ष पर लागू है, जबकि सामान्य व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P UPI लेनदेन पर शुल्क नहीं लगाया जाएगा.
सरकार के अनुसार यह MDR कोई सरकारी टैक्स नहीं है और इसे सीधे सरकार या NPCI द्वारा कर के रूप में नहीं वसूला जाएगा. इसका भुगतान भुगतान-प्रणाली से जुड़े पक्षों के बीच होगा.
हालांकि, मायावती बहनजी ने अपने संदेश में इसी व्यवस्था के व्यापक आर्थिक असर पर सवाल उठाया है.
नाम चाहे जो दें, जेब जनता की कटेगी: मायावती
बहनजी ने कहा कि सरकार भले ही इस अतिरिक्त आर्थिक बोझ को ‘कर’ मानने को तैयार न हो, लेकिन 15 अक्टूबर से लागू होने वाली व्यवस्था का असर आम लोगों पर पड़ सकता है.
उन्होंने अपने संदेश में जोर दिया कि इस नई व्यवस्था को चाहे कोई भी नाम दिया जाए, “जेब तो अन्ततः आम जनता की ही कटेगी” और उसका खर्च बढ़ेगा.
बहनजी ने कहा, “वैसे तो जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने की इस व्यवस्था को ’कर’ मानने को तैयार नहीं है, किन्तु दिनांक 15 अक्तूबर से लागू हाने वाली इस व्यवस्था को चाहे जो भी नाम दिया जाये जेब तो अन्ततः आमजनता की ही कटेगी, उसका ही ख़र्च बढ़ेगा.”
यहां मायावती बहनजी का मुख्य सवाल इस बात को लेकर है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था में आने वाली अतिरिक्त लागत का अंतिम असर बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों तथा आम उपभोक्ता के खर्च पर कितना पड़ता है।
देश की बहुसंख्यक जनता पहले से परेशान
मायावती बहनजी ने अपने संदेश में देश की आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि बहुसंख्यक जनता पहले से ही गरीबी और महंगाई की मार झेल रही है.
उन्होंने आगे कहा कि लोगों के बच्चे अशिक्षा और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं और व्यवस्था की अव्यवस्था से भी जनता परेशान है. ऐसे समय में सरकार की नीति और कार्ययोजना का स्वरूप लाभ कमाने वाली व्यावसायिक व्यवस्था से ज्यादा कल्याणकारी होना चाहिए.
मायावती बहनजी ने सवाल उठाया कि जब जनता आर्थिक तंगी और दुख-तकलीफ से गुजर रही है, तो उसकी चिंता सरकार नहीं करेगी तो कौन करेगा?
मायावती का सरकार से सवाल
अपने संदेश के जरिए मायावती बहनजी ने UPI की नई व्यवस्था को सिर्फ डिजिटल भुगतान के शुल्क का मामला नहीं माना, बल्कि इसे सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं से जोड़कर सवाल उठाया है.
उनका कहना है कि जब बड़ी संख्या में लोग गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब सरकार की नीतियों का केंद्र आम जनता का कल्याण होना चाहिए.
वो कहती हैं, “यह भी सर्वविदित है कि देश की बहुसंख्यक जनता अपार ग़रीबी व ज़बरदस्त महंगाई आदि की मार से त्रस्त है व उनके बच्चे अशिक्षा, बेरोज़गारी व अव्यवस्था आदि से पीड़ित हैं, ऐसे में सरकार की नीति व कार्ययोजना लाभ कमाने वाली व्यावसायिक कम व कल्याणकारी ज़्यादा हो तो यह उचित होगा. जनता की तंगी, दुख-तकलीफ की अगर सरकार चिन्ता नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा?“

