एन दिलबाग सिंह का कॉलम: सत्ता नही भगवान चाहिए

सभी वर्गों की समस्याएं और उन समस्याओं के समाधान एक जैसे नही होते. बड़े-बड़े नेताओं को, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक को मंदिरों, मस्जिदों के चक्कर लगाते देखा गया होगा. लेकिन, मान्यवर कांशीराम और बहनजी को शायद ही कभी किसी मंदिर-मस्जिद या पंडत-मौलवी के सामने झुक कर बैठे हुए देखा होगा.

वो शोषित वर्गों के उत्थान के लिए सामाजिक और राजनैतिक चेतना की कोशिश करते हुए दिखाई देते हैं, वो अच्छे से समझते है कि धर्म गरीब वर्गों के लिए किसी अफीम से कम नही है. जो दलितों, शोषितों को सत्ता की बजाय भगवान और धर्म में उलझाने का काम करे, समझो उनको आपकी बेवकूफी पर पूरा-पूरा यकीन है.

धर्म के महत्व को अगर समझना है तो गाँधी जी व बाबासाहेब के बीच 1932 में अंग्रेजी हकुमत द्वारा अछुतों के लिए पृथक निर्वाचन कानून पास होने के बाद गाँधी ने ये कानून रद्द करवाने के लिए जो रास्ता अछुतों को दिखाया था वो मंदिरों में प्रवेश का रास्ता था. मंदिरों में सवर्णों के साथ प्रवेश करके, साथ बैठकर खाना खिलवाकर अंग्रेजों को गाँधी ये समझाने में लगभग-लगभग सफल हो गए थे कि अब सवर्णों का हृदय परिवर्तन हो चुका है और अब जब छुआछूत ही खत्म हो रही है तो अछुतों को पृथक निर्वाचन जैसे कानून की जरूरत ही नही है.

अछुतों ने भी मंदिरों में प्रवेश पाकर, वहाँ का प्रसाद चखते ही, सवर्णों के साथ बैठकर खाना खाते ही बाबासाहेब के पृथक निर्वाचन कानून के माध्यम से संसद जाने के रास्ते पर चलने के लिए कोई लालसा ही नही दिखाई थी. अछुतों को हलवे पुड़ी के साथ-साथ मंदिर में विराजमान भगवान मिल चुके थे, अब कौन अम्बेड़कर, कैसा अम्बेड़कर जो भक्त और भगवान के बीच में दरार पैदा करे. हमको नही चाहिए ऐसा अम्बेड़कर!

धर्म राजनीति की सबसे टिकाऊ नीति है लेकिन धर्म से सब वर्गों का भला नही हो सकता बल्कि कुछ को छोड़कर बाकी का शोषण ही होता आया है. 1932 से 2022 तक के लगभग एक सदी के सफर में आम लोगों की सोच में बहुत ज्यादा बदलाव नही आए हैं. आज भी दलित, आदिवासी, पिछड़ों को अपने हक अधिकारों की बजाय गाँधी के मंदिरों में प्रवेश वाले रास्ते ही सुकुन देते हैं. सत्ता पाने के लिए नेता भी लोगों को वही रास्ता दिखा रहे जिनपर अम्बेड़करवादी विचार का कत्ल  किया जाता है.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह; ये लेखक के अपने विचार हैं)

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