जंतर-मंतर के आरक्षण विरोधी प्रदर्शन पर मायावती का सवाल, राहुल गांधी की भूमिका पर भी आपत्ति

नई दिल्ली, 23 अगस्त 2026। बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल में हुए जाति आधारित आरक्षण के विरोध और आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए संविधान में की गई आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने वाली मांगें सामाजिक बराबरी के लक्ष्य के खिलाफ हैं.

मायावती ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में केंद्र और राज्य सरकारों से आरक्षण विरोधी गतिविधियों को संरक्षण नहीं देने की अपील की. साथ ही उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के 21 अगस्त को संसद मार्ग थाने के बाहर किए गए धरने को लेकर भी सवाल उठाया.

जंतर-मंतर पर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग

21 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण नीति में बदलाव की मांग को लेकर बड़ी संख्या में लोग जुटे थे.

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा और आर्थिक स्थिति को आरक्षण का आधार बनाने की बात शामिल थी. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को मौके से हटाया और कई लोगों को हिरासत में लिया.

मायावती ने इस मांग को उचित नहीं माना. उनका कहना है कि SC, ST और OBC समाज को संविधान से मिले आरक्षण को प्रभावित करने वाली ऐसी मांगें समतामूलक समाज और सामाजिक न्याय के संवैधानिक उद्देश्य को नुकसान पहुंचा सकती हैं.

उन्होंने प्रदर्शन में शामिल लोगों से आरक्षण के मुद्दे पर ऐसा कोई कदम नहीं उठाने की अपील की जिससे सामाजिक बराबरी की संवैधानिक व्यवस्था प्रभावित हो.

आर्थिक आधार पर आरक्षण पहले से लागू यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था भारत में पहले से मौजूद है.

संविधान के 103वें संशोधन अधिनियम, 2019 के जरिए अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए. इनके तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10% तक अतिरिक्त आरक्षण का प्रावधान किया गया. यह मौजूदा SC, ST और OBC आरक्षण से अलग व्यवस्था है.

EWS व्यवस्था में वे लोग शामिल होते हैं जो मौजूदा SC, ST और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की आरक्षण योजनाओं के अंतर्गत नहीं आते. केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में भी स्पष्ट किया है कि EWS आरक्षण मौजूदा आरक्षण व्यवस्था से अलग है और इसमें संशोधन का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने Janhit Abhiyan v. Union of India मामले में 7 नवंबर 2022 को 3:2 के बहुमत से 103वें संविधान संशोधन की वैधता बरकरार रखी थी. अदालत ने आर्थिक मानदंड के आधार पर विशेष प्रावधान और आरक्षण को संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन नहीं माना.

इसलिए मायावती के पोस्ट में आर्थिक आधार पर आरक्षण की “नई व्यवस्था” का संदर्भ उस राजनीतिक मांग की ओर है जिसमें प्रदर्शनकारी मौजूदा जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार को प्रमुख मानदंड बनाने की बात कर रहे थे—न कि भारत में EWS आरक्षण पहली बार लागू होने की बात.

मायावती ने जातिवाद और आरक्षण को जोड़ा

मायावती ने अपने पोस्ट में डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि जातिवाद का त्याग ही सच्ची देशभक्ति का रास्ता है.

यहां मूल स्रोत के स्तर पर एक सावधानी जरूरी है. उपलब्ध आंबेडकर साहित्य/आंबेडकर फाउंडेशन की सामग्री में उनके राष्ट्रवाद संबंधी विचारों का सार “सही राष्ट्रवाद है जाति-भावना का परित्याग” के रूप में मिलता है. इसलिए इसे सीधे “जातिवाद का परित्याग ही सबसे बड़ी देशभक्ति है” शब्दशः आंबेडकर उद्धरण के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा.

मायावती का तर्क है कि भारत में SC, ST और OBC समुदायों ने लंबे समय तक जातिगत भेदभाव झेला है और इसी सामाजिक असमानता की पृष्ठभूमि में आरक्षण की व्यवस्था अस्तित्व में आई.

गरीबी हटाने की योजनाओं का भी उल्लेख

मायावती ने आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की सहायता के लिए सरकार द्वारा चलाए जा रहे गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का भी जिक्र किया.

उनका कहना है कि यदि इन योजनाओं का लाभ गरीबों तक पूरी तरह नहीं पहुंच रहा है तो समस्या सरकारी व्यवस्था, भ्रष्टाचार और क्रियान्वयन से जुड़ी है. उनके अनुसार इसका समाधान मौजूदा सामाजिक न्याय आधारित आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करना नहीं होना चाहिए.

उन्होंने EWS आरक्षण की व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन इसका लाभ सभी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा है.

आरक्षण लागू करने में सरकारी व्यवस्था पर सवाल
मायावती ने अपने पोस्ट में आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था के क्रियान्वयन को लेकर भी सवाल उठाए.

उनका कहना है कि SC, ST और OBC समाज को आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिल पाने के पीछे सरकारी व्यवस्था की कमियां और सामाजिक भेदभाव बड़ी वजह हैं. उन्होंने कहा कि इन वर्गों को आज भी गरीबी, जातिगत भेदभाव, शोषण और अत्याचार जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

इसी आधार पर उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से आरक्षण विरोधी गतिविधियों को संरक्षण नहीं देने की अपील की.

उन्होंने आम लोगों से भी आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक लाभ के लिए राजनीति नहीं करने और न ही ऐसी राजनीति को बढ़ावा देने की अपील की.

राहुल गांधी के धरने पर मायावती ने उठाया सवाल

मायावती के पोस्ट का सबसे राजनीतिक हिस्सा राहुल गांधी को लेकर है.

21 अगस्त को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी दिल्ली के Parliament Street Police Station के बाहर धरने पर बैठे थे. वह एक छात्र के मामले में FIR दर्ज कराने की मांग कर रहे थे. रिपोर्टों के मुताबिक मामला 20 जुलाई के जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान कथित गोली/पेलेट से घायल हुए छात्र से जुड़ा था. राहुल गांधी करीब पांच घंटे धरने पर बैठे और बाद में पुलिस ने FIR दर्ज की.

मायावती ने कहा कि एक पीड़ित व्यक्ति के मामले में FIR दर्ज कराने के लिए राहुल गांधी के धरने पर बैठने से BSP को कोई आपत्ति नहीं है.

लेकिन उन्होंने इसी दौरान जंतर-मंतर पर चल रहे आरक्षण विरोधी प्रदर्शन को लेकर कांग्रेस की भूमिका पर सवाल उठाया.

उनके अनुसार, जंतर-मंतर पर SC, ST और OBC समाज को जातीय आधार पर मिले आरक्षण को समाप्त करने की मांग को लेकर प्रदर्शन चल रहा था, लेकिन राहुल गांधी या उनके किसी कांग्रेसी साथी ने प्रदर्शनकारियों के पास जाकर उनसे बात करने या उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की.

मायावती ने इसे कांग्रेस की आरक्षण नीति पर सवाल खड़ा करने वाला रवैया बताया

एक ही दिन दो अलग-अलग मुद्दों पर राजनीतिक सक्रियता
इस पूरे घटनाक्रम में दो प्रदर्शन समान समय में चर्चा में रहे.

जंतर-मंतर: जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा/विरोध और आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने की मांग को लेकर प्रदर्शन.

Parliament Street Police Station: राहुल गांधी और अन्य नेताओं का घायल छात्र के मामले में FIR दर्ज कराने की मांग को लेकर धरना। बाद में FIR दर्ज की गई.

मायावती ने इन दोनों घटनाओं को जोड़ते हुए कांग्रेस की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया है.

मायावती के पोस्ट का सार

मायावती की बात को संक्षेप में सात बिंदुओं में समझा जा सकता है:

जंतर-मंतर पर जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ आर्थिक आधार की मांग का उन्होंने विरोध किया है.

SC, ST और OBC के लिए आरक्षण को सामाजिक असमानता के ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ते हुए उन्होंने इसे संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा बताया.

आर्थिक आधार पर आरक्षण पहले से मौजूद EWS व्यवस्था के रूप में लागू है.

उन्होंने गरीबी उन्मूलन योजनाओं के कमजोर क्रियान्वयन को सरकारी व्यवस्था की समस्या बताया.

आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन में सरकारी तंत्र और जातिगत भेदभाव को बाधा बताया.

उन्होंने सरकारों से आरक्षण विरोधी तत्वों को संरक्षण न देने और जनता से इस मुद्दे पर “सस्ती राजनीति” से बचने की अपील की.

राहुल गांधी के FIR के लिए धरने पर उन्होंने आपत्ति नहीं जताई, लेकिन जंतर-मंतर के आरक्षण विरोधी प्रदर्शन को लेकर कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल उठाया.

निष्कर्ष: मायावती का यह बयान केवल जंतर-मंतर के प्रदर्शन तक सीमित नहीं है. इसमें आरक्षण की सामाजिक पृष्ठभूमि, EWS व्यवस्था, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और कांग्रेस की राजनीतिक भूमिका—इन सभी मुद्दों को एक साथ उठाया गया है. खास तौर पर राहुल गांधी को लेकर उनकी टिप्पणी इस बहस को राजनीतिक रूप से और तीखा बनाती है. दूसरी ओर, जंतर-मंतर पर आर्थिक आधार की मांग वास्तव में हालिया प्रदर्शन का हिस्सा रही है, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% तक आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था 2019 से लागू है और इसकी वैधता सुप्रीम कोर्ट पहले ही बरकरार रख चुका है.

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