एन दिलबाग सिंह का कॉलम: दलितों की राजनीतिक समझ

कुछ रटी रटाई बकवास करना ही हमारी राजनीति की समझ है. मायावती तो कांशीराम के मिशन को खा गई, उसने बसपा को डुबो दिया है, उसको राजनीति से सन्यास ले लेना चाहिए वगैरा-वगैरा.  

2019 के लोकसभा चुनाव से कुछ दिन पहले की बात है, एक दिन कुछ दोस्तों में ऱाजनीति पर बहस छिड़ी हुई थी, मुझे भी सुनने में मजा आ रहा था. तभी एक साथी ने कहा कि आज के दौर में दलित वर्ग का सबसे बड़ा नेता कौन है.  मेरी भी जानने की उत्सुकता जागी, तभी लगभग सभी ने बहुमत से माना कि मायावती बहनजी दलितों की सबसे बड़ी नेता है.

मैंने उनसे कहा अगर मायावती बहनजी दलितों की सबसे बड़ी नेता है तो फिर दलित वर्गो के लिए आरक्षित सीटों पर उनके सबसे ज्यादा सांसद होने चाहिए थे. लेकिन, उनकी पार्टी के लोगों को तो संसद तक पहुँचने से रोकने के लिए ज्यादातर दलितों ने बसपा को वोट ही नही दिया.

सबकी बोलती बंद. क्योकि, 2014 में बहनजी की पार्टी का तो एक भी सांसद जीत नही पाया था और जो ज्यादातर दलित सांसद जीते थे वो भाजपा के थे. उससे पहले वाले चुनावों में कांग्रेस के हुआ करते थे. 2019 में बसपा के 10 सांसद जीते थे जिसमे दलित समाज से सिर्फ 2 ही थे.

इसका सीधा-सीधा मतलब तो यही हुआ कि आज देश का सबसे बड़ा दलित नेता मोदी जी है और उनसे पहले मनमोहन सिंह, सोनियाँ गाँधी, राहुल गाँधी होने चाहिए. मेरी ये बातें सुनकर सभी साथी मेरी बातों पर हंसने लगे, मैंने बड़े भोलेपन में उनके हंसने का कारण पुछा तो उन्होने बताया कि दलित, आदिवासी या पिछड़ों को राजनीति और लोकतंत्र में वोट की ताकत के बारे में कुछ पता होता तो आज दलित आदिवासी और पिछड़ों के ही मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्रीयों की लम्बी लिस्ट होती.

मैं भी कम चालु आदमी नही था, अपनी मुँछो पर मरोड़ी लगाई और कहकर आ गया कि तुम लोगों को राजनीति का क, ख, ग तक तो आता नही और वो मेरी बात सुनकर हंसने लगे,  उनकी देखा देखी मैं भी हंसने लगा. हो गई बराबरी- काम खत्म, मिल गई सत्ता?

अब दलितों को कितनी राजनीति आती है, उसकी चर्चा भी कर लेते है.

कुछ रटी रटाई बकवास करना ही हमारी राजनीति की समझ है. मायावती तो कांशीराम के मिशन को खा गई, उसने बसपा को डुबो दिया है, उसको राजनीति से सन्यास ले लेना चाहिए वगैरा-वगैरा.  

इन भांग पीये हुए लोगों को ये भी तो बताना चाहिए कि मान्यवर के समय में उनके साथ कितने लोग थे, अगर साथ थे तो देश के कितने राज्यों में बसपा की सरकारे हुआ करती थी, कौन- कौन मुख्यमंत्री रहा उन राज्यों का, कितनी वोट मिली थी, कितनी बार बसपा के प्रधानमंत्री बने थे.

कल भी ये समाज और इसक दिशाहीन युवा ऐसे ही वोट काटने वाले संगठन बनाकर मान्यवर कांशीराम के बारे में बकवास किया करते थे और आज भी वही कर रहे है. कल सवाल काशीराम साहेब पर थे, आज बहनजी पर है. सच्चाई तो ये है कि तुम्हारी नीयत, नीति, मेहनत और क्षमता सब कुछ दुसरों के खेत में मन लगाकर मेहनत करने वाले मजदुरों जैसी है, जिसके दिमाग में ये बैठ गया है कि वो खेत के मालिक बनने के लायक ही नही है.

 सारे साल मायावती को कोसने के बाद भी दलितों के नाम पर बने अनेकों दल किसी भी राज्य में ढ़ग से अपने बलबुते विधायकी या सांसदी के लिए जमानत तक निकलवा पाने की हैसियत में कई दशकों से नही हैं. 500-1000 वोट लाने में भी पसीने आ रहे है. लेकिन, जीभ इतनी लम्बी निकालते है कि पता नही क्या करने वाले है.

आइना देखोगे तो सच्चाई इतनी सी ही है. नब्बे के दशक से ही हमारे घरों में बैठे टीवी एंकर रूपी मेहमान बताते रहे कि बसपा खत्म हो गई, अब खत्म हुई, खत्म होने वाली है. कहकर कभी भाजपा के पक्ष में वोट डलवाने के लिए उकसाते रहे, तो कभी कांग्रेस व अन्य दलों के लिए. लेकिन, इन प्रोपगैंडो के बाद भी बसपा आजतक देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी ही रही, कुछ तो बात है इसकी विचारधारा में.

2003 में मान्यवर काशीराम के ब्रेन स्ट्रोक के बाद उनके राजनीति से दुर होने के बाद 2004 लोकसभा चुनाव हो या 2006 में उनकी मृत्यु के बाद 2007 का युपी विधानसभा चुनाव हो या 2009 का लोक सभा चुनाव हो या फिर 2012 का युपी विधान सभा चुनाव हो, बहन जी ने हर बाधा को पार करते हुए अपने मतदाताओं को सभांले रखने में बहुत अच्छे तरीके से वोटों में इजाफा करते हुए मान्यवर के सामाजिक व राजनीतिक मिशन को पीछे नही जाने दिया.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह; ये लेखक के अपने विचार हैं)

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