चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

‘चमारों की इतनी जुर्रत!
चमार राजनीति करेगा!
चमार भाषण सुनाएगा!
चमार देश चलाएगा!
यह कैसा कलियुग आ गया!’

यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी के गठन के पश्चात् बामसेफ तथा डीएस-4 के सहयोग से अम्बेडकरी विचारधारा देश के कोने-कोने तक पहुँच चुकी थी। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के पट्टी विधानसभा क्षेत्र में नीले झंडों से सुसज्जित मंच सजाया जा चुका था। मान्यवर श्री कांशीराम साहेब अगले दिन संबोधित करने वाले थे। दलित समाज में पर्व-सा उल्लास व्याप्त था। क्यों न होता, उनके रहबर जो पधार रहे थे!

किंतु अकस्मात् आधी रात को गाँव के बाहर आग की लपटें उठने लगीं। क्रोध और घृणा की मंद सुगबुजाहट अचानक तीव्र तथा उग्र हो उठी। ‘चमारों की इतनी जुर्रत! चमार राजनीति करेगा! चमार भाषण सुनाएगा! चमार देश चलाएगा! यह कैसा कलियुग आ गया! ये शब्द उच्चारते हुए कैरोसिन तेल की मदद से समूचा पंडाल आग के हवाले कर दिया गया। मंच के निकट सुंदर स्वप्नों की गोद में सोए दलितों पर अचानक लाठियों की वर्षा होने लगी। चारों ओर आग की लपटों में दलितों का रक्त दृष्टिगोचर हो रहा था। देखते-ही-देखते धरती रक्तरंजित हो गई। सर्वत्र चीखें गूँज रही थीं। क्षणभर में मंच अग्नि की ज्वालाओं में समा गया। निकटवर्ती गाँवों में दलितों का उल्लास करुण क्रंदन में परिवर्तित हो गया। समीपवर्ती गाँवों में भी दलितों पर आक्रमण प्रारंभ हो गया।

ये आग लगाने वाले कौन थे? कौन थे जो सुंदर स्वप्नों में मग्न दलितों पर आधी रात को अचानक लाठियाँ बरसाने लगे? दलितों से इतनी घृणा क्यों? फिलहाल, जातिवादी आक्रोशकों के घृणा का आवेग शांत हुआ और धीरे-धीरे जातिवादी आतंकवादियों का झुंड रात्रि की अंधकारमयी गोद में विलीन हो गया। बहुजन आन्दोलन से जुड़े इलाहाबाद जिले के हांडियां विधानसभा क्षेत्र के निवासी श्री अमरनाथ ‘निडर’ जी उस मंजर को याद करते हुए कहते हैं कि प्रातःकाल तक दूरदराज़ तक की दलित बस्तियों में मातम छा गया। 

निडर साहेब आगे बताते हैं कि – ‘बसपा के मंच जलाने की यह अकेली वारदात नहीं है। देश के तमाम कोनों में बसपाइयों, ख़ासकर चमारों, पर बहुत अत्याचार हुए हैं। तमाम जगहों पर उनके मंच जलाये गए हैं। झंडे, पोस्टर, बैनर तक को नहीं लगने दिया गया और यदि जद्दोजेहद के बाद लग भी गए तो कुछ देर बाद ही फ़ाड़ दिया गया। उस दौर में यह सब चमारों के साथ बहुत सामान्य घटना मानी जाती थी।’

फिलहाल, जनसभा वाली जगह पर मान्यवर श्री कांशीराम साहेब का आगमन हुआ। उन्होंने परिस्थिति का अवलोकन किया। रक्तरंजित दलितों ने मान्यवर साहेब से कुछ मोहलत माँगी कि हम शीघ्र ही दूसरा मंच तैयार कर लेंगे। किंतु लोकतंत्र के महानायक मान्यवर श्री कांशीराम साहेब ने कहा—नहीं! नवीन मंच बनाने की आवश्यकता नहीं। मैं इसी दग्ध मंच से देश को संबोधित करूँगा।

दलितों ने दग्ध मंच से मान्यवर साहब को सुनने के लिए हजारों की संख्या में अपने दैनिक कार्य, मजदूरी तथा स्कूली बच्चे विद्यालय छोड़कर, उत्साहपूर्वक भाग लिया। कष्ट था, तथापि हौसला बुलंद था। क्यों न होता, देश का कारोबार जो संचालित करना था।

मान्यवर साहेब का संबोधन आरंभ हुआ। चारों ओर तालियों की गड़गड़ाहट तथा गगनभेदी नारे गूँज रहे थे। ‘जय भीम’, ‘बीएसपी की क्या पहचान, नीला झंडा हाथी निशान’, ‘तख्त बदल दो, ताज बदल दो, बेईमानों का राज बदल दो’, ‘चढ़ गुंडों की छाती पर, बदन दबेगी हाथी पर’, ‘चलो चलें सरकार बनाएँ, हाथी वाली बटन दबाएँ’ जैसे नारों से आकाश थर्रा उठा। मान्यवर साहेब ने दग्ध मंच की राख पर खड़े होकर घोषणा की—‘जिन लोगों ने आज तुम्हारे मंच को जलाया है, कल वही तुम्हारा झंडा ढोएँगे।’

इस घटना के कुछ वर्ष पश्चात् 1989 में बहनजी सहित बसपा के तीन सांसद देश की सर्वोच्च पंचायत में पहुँचे। इन्हीं तीन सांसदों के सहयोग से मान्यवर साहब ने तीन महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न किए—मंडल आयोग को लागू करवाया, संसद में बाबासाहेब की प्रतिमा स्थापित कराई तथा दलितों की जातिवादी आतंकवादियों से रक्षा हेतु एससी-एसटी एक्ट का निर्माण कराया।

बाबासाहेब को इतिहास के पन्नों तक से मिटाने को प्रतिबद्ध कांग्रेस ने, मजबूरन, स्वयं लखनऊ में बाबासाहेब के नाम पर केंद्रीय विश्वविद्यालय की घोषणा की। बाबासाहेब से घृणा करने वाले हिंदुत्व के रक्षक (भाजपा) आज लखनऊ सहित भारत के अनेक स्थानों पर बाबासाहेब की प्रतिमाएँ स्थापित करा रहे हैं। इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी, जो बाबासाहेब, मान्यवर साहेब, बहनजी, दलितों एवं अति पिछड़ों से घृणा करती है, आज विवश है अपने पोस्टरों पर बाबासाहेब तथा मान्यवर साहेब की छायाचित्र लगाने को। यह सब उन्हीं ‘चमारों की चेतना’ का परिणाम है, जिनके मंचों को कल तक जलाया जाता था। जातिवादी कुव्यवस्था से पीड़ित दलितों का लक्ष्य भारत में ‘सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति’ है, जिसमें राजनीतिक सत्ता सबसे सशक्त माध्यम है। अतः दलितों ने बाबासाहेब की विचारधारा को बसपा के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का महान कार्य संपन्न किया है।

और जब दलितों, विशेष रूप से चमारों, ने अम्बेडकरवादी विचारधारा को अन्य अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों तक विस्तारित किया, तो बाबासाहेब की विचारधारा ने बसपा के माध्यम से भारत की सबसे बड़ी आबादी वाले प्रदेश उत्तर प्रदेश की धरती पर ‘अपनी शर्तों, अपने सिद्धांतों’ पर आत्मनिर्भर शासन स्थापित किया।

मान्यवर साहेब के कुशल व ऐतिहासिक मार्गदर्शन तथा बहनजी के यशस्वी नेतृत्व में चमारों ने सभी एससी, एसटी, ओबीसी तथा धर्मांतरित अल्पसंख्यकों को एकजुट कर बहुजन समाज को संगठित किया तथा अम्बेडकरवाद को पूरे भारत में इतना सुदृढ़ स्थापित कर दिया कि बसपा का मंच जलाने वाले लोग भी आज बसपा का झंडा उठाकर गगनभेदी ‘जय भीम, जय बसपा’ के नारे लगा रहे हैं।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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