कविता: भारतीय समाज की दशा एवं दिशा

1914 में घूरे बोले पैट्रिक गेडेस से
क्या है समाजशास्त्र?
गेडेस बोले घूरे से
अभी तो इसका है आगाज,

आर. के. बोले डी. पी. से 1921 में
समाजशास्त्र में मूल्यों का है आधार
मुम्बई और लखनऊ के समाजशास्त्र में
बुक व्यू का होता रहा व्यवहार

Prof Vivik Kumar Poem

तब बोले दिल्ली से श्रीनिवास
शाह, बेते, राव आदि को लेकर साथ
समाज शास्त्रियों को
गांव में करना होगा प्रवास

फिर क्या था
भारतीय समाजशास्त्र में
बुक व्यू और फील्ड व्यू
का होने लगा वाद-विवाद

पर जे.एन.यू. में योगेंद्र और उमन
को यह सब ना था मंजूर
बहुयामी पद्धतिशास्त्र और संविधान संवत
पाठयक्रम से भरा समाजशास्त्र में नया गुरुर

70-80 के दशक से आने लगी
जेंडर के समाजशास्त्र की आवाज
देसाई, दुबे, पर्वथम्मा, वीणा, मीनाक्षी
रेगे, मैत्रीय, नोंगबरी, अंजुम की बात रही खास

इसी समय अल्पसंख्यक एवं आदिवासी समाजों
को समाजशास्त्र करने लगा स्पर्श
शायद इसलिए एंथ्रोपॉलजी और सोशियोलॉजी
के रिश्तों पर होने लगा विमर्श

लगभग सौ साल लगे निचली पायदान के
समाजशास्त्र को आने में
नंदू राम को अपनी मृदु भाषा में
पर्सपेक्टिव फ्रॉम बिलो को जमाने में

फिर भी 21वीं सदी में पूछ रहे हैं विवेक कुमार
हाउ मच ईगलिटेरियन इज समाजशास्त्र?
हाउ मच ईगलेटिरियन इज समाजशास्त्र?

(रचनाकार: प्रो विवेक कुमार)

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