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मत-विमत

सपा का षड्यंत्र और दलितों की एकता: एक चिंतन

भारतीय राजनीति का परिदृश्य एक विशाल और जटिल कैनवास-सा है, जहाँ रंग-बिरंगे सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में करने हेतु विभिन्न दल सूक्ष्म से...

हिंदुत्व, ध्रुवीकरण और बहुजन समाज: खतरे में कौन?

प्रस्तावना: एक गढ़ा हुआ नैरेटिव पिछले कुछ दशकों से भारत में यह नैरेटिव गढ़ा गया है कि हिंदुत्व खतरे में है। इस कथन ने जनमानस...

दलित साहित्य और बसपा: प्रतिरोध से सृजन की संनाद यात्रा

दलित साहित्य और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भारतीय समाज में शोषित वर्गों के उत्थान और उनकी आवाज को सशक्त करने के दो प्रभावशाली माध्यम...

व्यवस्था परिवर्तन का प्रचंड अग्निकांड: दलित समाज का नवजागरण और अमर विजय गाथा

आज का युग अधीरता का नहीं, क्रांति का युग है। चाहे जीवन की संकरी गलियां हों या राजनीति का विशाल रणक्षेत्र, हर दिल में...

जज यशवंत वर्मा प्रकरण और नालसा की मणिपुर विजिट के बीच संभावित कनेक्शन

मार्च 2025 में भारतीय न्यायिक और राजनीतिक परिदृश्य में दो समानांतर घटनाएँ चर्चा में रहीं—दिल्ली उच्च न्यायालय के जज यशवंत वर्मा से जुड़ा विवाद...

समता, समरसता और इनकी प्रासंगिकता

समता और समरसता दो ऐसे शब्द हैं जो भारतीय सामाजिक और दार्शनिक संदर्भ में गहरे अर्थ रखते हैं। ये दोनों अवधारणाएं सामाजिक व्यवस्था बनाने...

न्यायपालिका में आरक्षण: लोकतंत्र और विविधता का सवाल

भारतीय संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमें विविधता को संरक्षित करने और सभी वर्गों को समान अवसर प्रदान करने...

दलित-पिछड़ा गठजोड़ और बसपा: 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के संदर्भ में संभावित प्रभाव और भविष्य

बहुजन समाज पार्टी (बी.एस.पी.) ने अपनी स्थापना से ही दलितों, पिछड़ों, और अन्य वंचित समुदायों के उत्थान और सशक्तिकरण को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया...

पड़ताल: ‘बसपा’ के खिलाफ ही दुष्प्रचार क्यों?

भारत में तमाम राजनीतिक दल सक्रिय हैं। कुछ मजबूती से सत्ता में तो कुछ विपक्ष में क़ायम हैं। सबके अपने-अपने मुद्दे और निहित उद्देश्य...

ग्रोक का अनफ़िल्टर्ड सच और भारत में सूचना का भविष्य

पिछले दो दिनों में, एआई की एक और नई शक्ति सामने आई है. सिर्फ़ दो महीने पहले, यह विचार कि ऐसा कुछ हो सकता...

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