सकारात्मक एजेण्डा ही शोषित को सत्तारूढ़ कर सकता है

समतावाद का पथ और मनुवादी जाल

भारत में बहुजन समाज को उसके स्वाभाविक एजेण्डे से विमुख करने हेतु तीनों मनुवादी दल—भाजपा, सपा और राजद—धर्म और रामचरितमानस की चर्चा छेड़कर एक-दूसरे के सहायक बन गये हैं। इस कुचक्र में बहुजन समाज का अज्ञानी तबका भी लाठी भाँज रहा है। इसका प्रत्यक्ष लाभ इन जातिवादी और मनुवादी दलों को प्राप्त होगा, किन्तु मजलूम जनता के हिस्से में पीड़ा के अतिरिक्त कुछ नहीं आयेगा। यदि बहुजन समाज को चर्चा ही करनी है, तो उसे बुद्ध, अम्बेडकर, कबीर और रैदास जैसे महानायकों की वैचारिकी पर केन्द्रित करनी चाहिए। इससे समतामूलक समाज के सृजन हेतु समतावादी संस्कृति का प्रचार-प्रसार होगा, समाज की पहुँच और समझ का विस्तार होगा, और वह अपने मूल लक्ष्य की ओर अग्रसर होगा।

वर्तमान में हिन्दू धर्म और रामचरितमानस की निन्दा कर बहुजन समाज भले ही संतुष्ट हो कि वह क्रान्ति कर रहा है, किन्तु हकीकत यह है कि वह अपने सकारात्मक एजेण्डे से भटककर शत्रुओं के एजेण्डे—हिन्दुत्व और रामचरितमानस—पर कार्य कर रहा है। यह दुखद है कि बहुजन समाज आज उसी नकारात्मक मार्ग पर चल रहा है, जिसकी मान्यवर कांशीराम ने सदा मनाही की थी। उन्होंने कहा था, “दूसरे की रेखा मिटाने से अपनी रेखा नहीं बनती” (स्रोत: बहुजन संगठक, 10 मई 1990)। यदि बहुजन समाज मान्यवर के सकारात्मक एजेण्डे पर नहीं लौटा, तो उसका अहित निश्चित है। इस नकारात्मकता से न तो समता का मार्ग प्रशस्त होगा, न ही समाज की चेतना जागृत होगी।

ऐसे में बहुजन समाज को शत्रुओं के किसी भी एजेण्डे पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने से पूर्व अपने लक्ष्य—समतामूलक समाज के सृजन—और इसके सकारात्मक एजेण्डे पर चिन्तन करना चाहिए। हिन्दू धर्म और इसकी संस्कृति—रामचरितमानस व अन्य शास्त्रों—की आलोचना से बचना चाहिए, क्योंकि यह एक नकारात्मक मार्ग है, जो लाभ के बजाय हानि ही पहुँचाता है। इससे शत्रु का एजेण्डा ही मजबूत होता है और बहुजन समाज अपनी ऊर्जा व्यर्थ गँवाता है। इसके स्थान पर यह प्रश्न उठाना अधिक प्रासंगिक है कि शूद्र समाज इस अमानवीय हिन्दू धर्म और संस्कृति का त्याग क्यों नहीं कर पा रहा? इसकी बुराइयाँ सर्वविदित हैं, फिर भी लोग इससे क्यों चिपके हैं? आश्चर्यजनक रूप से शूद्रों का शिक्षित वर्ग अनपढ़ों से भी अधिक इसकी चासनी में डूबा है—यह क्यों? इस पर सम्यक् चिन्तन अपरिहार्य है।

हमारा मत है कि हिन्दू धर्म और शास्त्रों की कमियों को गिनाने से अधिक सकारात्मक प्रभाव इसका त्याग करने से होगा। बाबासाहेब ने यही मार्ग अपनाया था, जब उन्होंने हिन्दू धर्म को अस्वीकार कर बौद्ध धम्म को अंगीकार किया (स्रोत: आंबेडकर, “बुद्ध एंड हिज धम्म,” 1956)। मान्यवर साहेब ने अपने जीवनकाल में समतावादी बौद्ध दर्शन के प्रचार की अपील की, और आज बहनजी भी अपने सकारात्मक कृत्यों से यही संदेश दे रही हैं। फिर भी, शूद्र समाज इन महानायकों का अनुसरण क्यों नहीं कर पा रहा? यह प्रश्न आज की सबसे बड़ी चुनौती है। यदि शूद्र समाज इस दिशा में कदम बढ़ाये, तो परिणाम कहीं अधिक कारगर होंगे। केवल आलोचना से नहीं, बल्कि सकारात्मक विकल्प अपनाने से ही समता का स्वप्न साकार हो सकता है।

अतः बहुजन समाज को बसपा के सकारात्मक एजेण्डे पर दृढ़ रहना चाहिए। शत्रुओं के एजेण्डे—हिन्दू धर्म और रामचरितमानस—पर प्रतिक्रिया देने के बजाय अपने एजेण्डे—बुद्ध-अम्बेडकरी विचारधारा—को चर्चा के केन्द्र में लाना चाहिए, ताकि शत्रु को उस पर प्रतिक्रिया देनी पड़े। यह सकारात्मक एजेण्डा, आत्मनिर्भर रणनीति, अपने नायकों-नायिकाओं के दर्शन, संघर्ष और संदेश ही शोषित समाज को सत्तारूढ़ कर सकते हैं। इसी के बल पर वह अपने सम्यक् विकास, सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक सशक्तिकरण के द्वार खोल सकता है। हिन्दुत्व की चर्चा में उलझकर बहुजन समाज अपनी शक्ति और समय नष्ट कर रहा है, जबकि उसे अपने गौरवशाली इतिहास और समतावादी विचारों को जन-जन तक पहुँचाने पर ध्यान देना चाहिए।

यह सत्य है कि मनुवादी दलों का यह कुचक्र बहुजन समाज को उसके मूल उद्देश्य से भटकाने का सुनियोजित प्रयास है। रामचरितमानस और हिन्दू धर्म की चर्चा छेड़कर ये दल न केवल आपस में सहयोग कर रहे हैं, बल्कि बहुजन समाज को भी इस भँवर में फँसा रहे हैं। किन्तु बहुजन समाज को यह समझना होगा कि नकारात्मकता का जवाब नकारात्मकता नहीं, बल्कि सकारात्मकता से देना होगा। बुद्ध की करुणा, अम्बेडकर की विद्वत्ता, कबीर की सादगी और रैदास की समता ही वह प्रकाश है, जो इस अंधेरे को चीर सकता है। बहनजी आज भी इस मार्ग पर अडिग हैं, और बसपा इस सकारात्मक एजेण्डे की वाहक है। यदि बहुजन समाज इस पथ पर नहीं चला, तो वह अपने ही हाथों अपना भविष्य अंधकारमय करेगा। अतः समय है कि बहुजन समाज इस जाल से बाहर निकले और अपने सकारात्मक एजेण्डे को अपनाकर समतामूलक समाज की नींव रखे।


स्रोत और संदर्भ :

  1. डॉ. बी.आर. आंबेडकर, “बुद्ध एंड हिज धम्म,” 1956, संकलित रचनाएँ, खण्ड 11।
  2. मान्यवर कांशीराम, “सकारात्मक एजेण्डा,” बहुजन संगठक, 10 मई 1990, अंक 5, वर्ष 8।
  3. प्रो. विवेक कुमार, “समतावादी संस्कृति और बहुजन,” इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, 2015।
  4. बसपा आधिकारिक बयान, “बुद्ध-अम्बेडकरी विचारधारा,” 2020।
  5. “हिन्दुत्व और बहुजन,” द हिन्दू, 20 जनवरी 2022।

— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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