एन दिलबाग सिंह का कॉलम: सत्ता इतिहास और वैचारिकी

संघर्ष और हवा हवाई बातों मे बहुत फर्क होता है. आज के दौर मे संघर्ष का जो सबसे ताकतवर तरीका सामने आया है, वो तरीका वैचारिकी का है वरना अम्बेड़कर या काशीराम जैसे लोगों ने ना कभी तलवार चलाई है और ना ही किसी भाले से लड़े है. लेकिन, अपने विचारों से बहुत बड़े सामाजिक परिवर्तन की नींव रखकर गए है.

इसलिए, विचारों की ताकत को समझो, ये फालतु की हवा हवाई बातें शोषितों, दलितों, आदिवासीयों और पिछड़ों के किसी काम की नही है, इन लोगों को नई दिशा सिर्फ बाबा साहेब अम्बेड़कर जैसे महापुरूषों के विचार ही दे सकते है.

बिना बात की अकड़ और हेकड़ी से शोषितों व वंचितों को कुछ हासिल नही होना, आज तक हुआ भी नही है – सिवाय पुलिस केस, कोर्ट कचहेरी के चक्कर, आपसी रंजिश और बदले की आग मे हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएँ ही मिलनी है. फिर भी कुछ समझ मे ना आए तो बैठकर सोचना की हथियारों के बलबुते नक्सलियों ने आजतक क्या हासिल कर लिया – उनमे भी तो अधिकतर अपने ही देश के गरीब दलित आदिवासी भाई बहन शामिल है.

समाज की ताकत उसकी संगठित ताकत होती है, उसका इतिहास होता है और इतिहास भी उन्ही का जिंदा और गौरवशाली होता है जिनकी सत्ता होती है. अपने बाप भाईयों को मारकर और सत्ता की ताकत के बलबुते प्रजा का दमन करके भी राजा महाराजा अपना मनचाहा इतिहास शिलालेखों, मुद्राओं आदि पर अंकित करवा गए है.

इतिहास हमेशा ताकतवर लोगों का ही लिखा जाता है. गरीब और मजदुरों का तो जिन्दगी की आखिरी सांस तक रोजी रोटी के लिये सिर्फ संघर्ष मिलता है. राजा की जय जयकारे लगाने के लिए पहले भी भीड़ लगती थी और आज लोकतंत्र के राजाओं के लिए भी जयकारे लगाने वालों की भीड़ की कोई कमी नही है.

इतिहास गवाह है, राजा के ऐसो-आराम उस समय भी चलते थे जब अकाल और भुखमरी से आम लोग घुट घुटके जी नही रहे थे, बल्कि घुट घुटकर मर रहे थे . कमाल की बात तो ये थी कि मजदुरों और गरीबों को राजा मे हमेशा अपना अन्नदाता और खुदा नजर आता था. क्योकि, धर्म के ठेकेदार सत्ता के साथ मिलकर मलाई चाटने का काम करते थे और जनता को धर्म के नाम बनी सच्ची झुठी कहानियों मे उलझाये रखते थे. फिर भला गरीब जनता का भला कैसे हो सकता था.

जब देश मे आपातकाल जैसी स्थिति बनती तो मलाई खाने वाले धर्म के ठेकेदार आदि उन राजाओं के और ज्यादा जयकारे लगवाते थे, राजा को जनता का भगवान तक बताने का काम करते थे, ताकि कोई विरोध ना करे. देश मे ना तो कभी राजाओं के ऐसो आराम बंद हुए और ना ही कभी गरीब और मजदुरों का सही मे भला हुआ. फिर पता नही धरती पर कहाँ से कार्ल मार्क्स, फुले, मार्टिन लुथर, अम्बेड़कर, पेरियार और काशीराम जैसे लोगों ने जन्म लिया और धीरे-धीरे गरीब और मजदुरों के हलों की बातें नारों मे बदलती चली गयी. बहुत कुछ बदला, राजा भी बदले और राजा बनने के तरीके भी बदले. राजशाही का स्थान जनता के वोटों से चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों ने ले लिया.

समय बीतता चला गया और इन महान विचारकों के विचार भी धीरे-धीरे सत्ता के सामने बिना आवाज के दम तोड़ने लगे. एक बार फिर वोटों से चुने हुए राजाओं के जय जयकारे गुंजने लगे है और कमाल की बात तो ये है कि आज भी नारे लगाने वालो में वही मजदूर, गरीब और नौकरीपेशे वाला मध्यमवर्गीय वर्ग ही है. राजा पहले अपना गुणगान करवाने के लिए भांडो की टीम रखते थे, आजकल ये काम मीडिया और सोशल मीडिया करती है . काम पुराना ही है लेकिन तरीके मॉडर्न हो चुके हैं.

लेकिन, एक बात सच ये भी है कि लोकतंत्र मे वैचारिकी का द्वंद कभी भी पुरी तरह से नही मरता है, वो जब भी आवाज तेज करता है, जमी जमाई सत्ता उखड़ने लगती है. पहले राजा सेना के बल पर प्रदेश जीतता था और आज जनता की खामोशी भी सबकुछ छीन लेने की ताकत रखती है. इस खामोशी की आवाज को सुनने की कोशिश कीजिये, भविष्य की धुंधली-धुंधली तस्वीर और साफ नजर आने लगेगी.

समय आ गया है कि वंचितों, शोषितों को भी अपनी वोट से राजा चुनते वक्त विचारधारा को भी चुने, जो विचारधारा सही मे उनके हकों के लिए खड़ी हो, उनको मजबुत बनाये, ताकतवर बनाये और खुद उस सामाजिक सोच मे बदलाव के साथ मजबुती से खड़े नजर आये. बाबा साहेब और मान्यवर जैसे महापुरुषों का संघर्ष और विचारधारा कोई युज एंड थ्रो का आइटम नही है बल्कि, बड़े साम्राज्य की मजबूत नींव है, करोड़ों लोगों की उम्मीदे हैं.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह, यह उनके निजी विचार हैं)

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