एन दिलबाग सिंह का कॉलम: मीडिया की ताकत

2014 के बाद से देश की राजनीति में परिस्थितियाँ बहुत कुछ बदल चुकी है, कांग्रेस और वामपंथी जैसे सैकड़ों वर्ष पुराने जमे जमाएं राजनीतिक दल भी जड़ से हिल चुके हैं. बसपा जैसी पार्टी का अम्बेड़करवादी विचारधारा वाला वोटर तक बाबासाहब और मान्यवर द्वारा दिखाए रास्ते पर चलने मे कन्फयूज सा दिख रहा है. सपा बसपा जैसे बड़े दल गठबंधन करके भी बहुत कुछ नही हिला पाए. सपा अपने परिवार की 5 यादव बाहुल्य सीटों से आगे नही बढ़ पा रही. प्रधानमंत्री, मंत्री और उपप्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले जाट नेताओं के दल रालोद और इनैलो खाता तक खुलने के इंतजार मे है. ऐसे मे बसपा 10 लोकसभा सांसद जीतकर भी 2022 मे एक विधायक पर सिमट चुकी है. उत्तर भारत मे भाजपा के बाद बसपा के सबसे ज्यादा सांसद है, कांग्रेस तीसरे नम्बर पर और सपा चौथे नम्बर पर है.

यही हाल जब तक रहेंगा समोसे मे आलु, तब तक रहेगा बिहार मे लालु जैसी पार्टी राजद का बिहार मे कोई सांसद लोकसभा में महागठबंधन करके भी नही जीत पाया, क्या ये आश्चर्यजनक नही है? कांग्रेस का मजबूत गढ़ माने जाने वाले उत्तर पश्चिम भारत में भी तकरीबन राज्यों मे कांग्रेस लोकसभा मे खाता तक नही खोल पा रही, दहाई का आंकड़ा पार करना तो उनके लिए भी सपना बन चुका है. क्या आपको इन सभी बातों का कारण सिम्पल सा नजर आता है?

आज के दौर मे मीडिया+ सोशल मीडिया+ धर्म+ कॉरपोरेट सभी मिलकर चुनाव लड़ रहे है, जहाँ कोई विशेष पार्टी जनहित के मुद्दों पर वोट नही ले पा रही हों, वहाँ मीडिया और धर्म कोरपोरेट के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं और सोशल मीडिया की आक्रामकता से वोट मिल रहे हैं. टीवी पर मुद्दे विहीन मुर्गों की लड़ाई मे आम जनता को मजा आ रहा है. इस दौर में लोगों को अपनी पार्टी की विचारधारा और नेताओं पर भरोसे को बचाये रखना जरूरी है, वरना मुर्गों की लड़ाई देखते-देखते सब मैदान खाली हो जायेंगे.

जब से टीवी न्यूज चैनलों ने खुलकर राजनीति करनी शुरू की है, तब से राजनीति के ऐजेंडे टीवी पर सेट होने लगे हैं, सरकारें टीवी वालों ने बनानी शुरू कर रखी हैं. साल भर पहले सर्वे दिखा-दिखाकर लोगों के दिमाग पर कब्जा कर लिया जाता है, आप माइंडवाश करवा कर खुश हो. सिम्पल शब्दों में कहुँ तो ये Trust Deficit यानि अपनी विचारधारा पर भरोसे की कमी से बाहर तभी आ सकते हो, जब आप इस बात को अच्छे से समझ लो कि टीवी अखबार लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ नही है बल्कि चुनाव जिताने की प्रचार सामग्री बन चुकी है, तब तक वही कहावत बार-बार सुनते रहिये कि मालिक की मालकिन पर बस चलती नही तो गधे के कान मरोड़े. यहाँ मालिक वोटर है, मालकिन टीवी अखबार है और गधे के रोल मे आपकी विचारधारा से मेल खाती पार्टी है जो सबसे ज्यादा पीड़ित भी है, दर्द में भी है.

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