स्वतंत्र बहुजन राजनीति बनाम परतंत्र बहुजन राजनीति: प्रो विवेक कुमार

स्वतंत्र बहुजन राजनीति” और “परतंत्र बहुजन राजनीति” पर प्रो विवेक कुमार का यह लेख भारत में दलित नेतृत्व की अनकही कहानी को उजागर करता है. 1930 से 1970 के बीच के स्वतंत्र आंदोलनों और बाहरी प्रभावों से प्रभावित राजनीति के बीच के संघर्ष को इस लेख में रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है. क्या कभी आपने सोचा कि बहुजन समाज की आवाज़ कैसे स्वतंत्रता और परतंत्रता के जाल में फंसी? इस लेख में इन सवालों के जवाब मिलने के साथ ही आधुनिक समय में उनकी भूमिका को समझने का एक अनूठा नजरिया सामने आता है. आगे पढ़ें और इस रोमांचक यात्रा में शामिल हों!

स्वतंत्र बहुजन राजनीति बनाम परतंत्र बहुजन राजनीति

स्वतंत्र बहुजन राजनीति में बहुजन खुद अपना राजनैतिक दल और विचारधारा बनाते हैं. वे ऐसे दलों में मुख्यधारा होते हैं. वे खुद अपने नारे गढ़ते है और अपने कार्यक्रम बनाते हैं.

ऐसे दलों में बहुजन अपने दलों को स्वयं के वित्त से पोषित करते हैं. इसके लिए मान्यवर कहा करते थे “सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेंट विल बी रन बाई सेल्फ हेल्प” (आत्मसम्मान का आन्दोलन आत्म सहायता से चलेगा), अगर दूसरे से सहारा लेंगे तो उसका इशारा भी आ जायेगा.

इसके विपरीत ‘परतंत्र बहुजन राजनीति’ में बहुजन नेता सवर्ण समाज बाहुल्य वाले दलों में पाए जाते हैं. वहां वे मुख्यधरा न होकर सवर्ण बाहुल्य वाले दलों में अनुसूचित जाती प्रकोष्ठों या एस. सी. सेल में बंद होते हैं.

ऐसे दलों में बहुजन समाज के नेता की अपनी आत्मनिर्भर विचारधारा एवं नारे नहीं होते. उसे सवर्ण समाज बाहुल्य वाले दलों की विचारधारा एवं नारों को ही दोहराना पड़ता है.

अर्थात “परतंत्र बहुजन राजनीति” बहुजन नेता का कोई आत्मनिर्भर आस्तित्व नहीं बचता जिससे की वो बहुजनो में मुद्दे को उठा सके. वो वहाँ मान्यवर कांशीराम की भाषा में ‘चमचा’ बन कर रह जाता है.

कल्पना कीजिये की 1930 और 1970 के दशक में स्वतंत्र बहुजन (आत्मनिर्भर) राजनीति करना कितना कठिन रहा होगा! धन्य है बाबासाहब, मान्यवर कांशीराम और बहनजी जिन्होंने स्वतंत्र राजनीति की नीव रखी.

जबकि आज जिन्होंने आरक्षण का लाभ लिया, जिनके पास पैसा, शोहरत, सुविधाएँ आदि सब कुछ है फिर भी वे “पे बैक टू सोसाइटी” के फॉर्मूले का अनुसरण करने के बजाये “परतंत्र राजनीति” के लिए अपना सबकुछ गिरवी रख रहे हैं.

यह उनका व्यक्तिगत स्वार्थ है या नहीं यह फैसला मैं बहुजन जनता पर छोड़ता हूँ. आप ही तय करें.

(लेखक: प्रो विवेक कुमार, ये लेखक के अपने विचार हैं)

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