वोट का सही इस्तेमाल मतलब ‘संविधान का राज़’

भारत में विषमतावादी और समतावादी संस्कृति का द्वंद्व : बहुजन समाज का सकारात्मक पथ

भारत में अनेक राजनैतिक दल, उनके सहयोगी संगठन और विविध समूह विद्यमान हैं, किन्तु यदि भारत की राजनीति और सामाजिक संरचना पर सूक्ष्म दृष्टि डाली जाये तो यहाँ मूलतः विषमतावादी और समतावादी संस्कृति के वाहकों के मध्य ही यथार्थ संग्राम दृष्टिगोचर होता है। समतावादी संस्कृति की ध्वजवाहक बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को तथाकथित मुख्यधारा के संसाधन सम्पन्न समाज ने ‘हाशिये पर है, समाप्त हो चुकी है’ इत्यादि प्रचारित कर बहुजन समाज को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बनाम कांग्रेस और उनके सहयोगियों के मध्य उलझाये रखा है। इस प्रकार विषमतावादी संस्कृति के संवाहक दोनों दलों और उनके सहयोगी राजनैतिक व सामाजिक संगठनों ने जनमानस को भ्रमित कर सम्पूर्ण भारतीय राजनीति को भाजपा बनाम कांग्रेस के रूप में दो खेमों में ध्रुवीकृत कर दिया है। यदि संविधान लागू होने के पश्चात् से वर्तमान तक के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो इस अवधि में विभिन्न नामों से संगठन और दल अवश्य गठित हुए, किन्तु सम्पूर्ण राजनीति इन्हीं दो खेमों में विभक्त रही, जो एक-दूसरे के लिए संनाद्ध रहे हैं, न कि संवैधानिक मूल्यों के प्रति।

आज बहुजन समाज अपने स्वयं के एजेण्डे से विमुख होकर ‘संविधान संकट में है’ पर बल दे रहा है, परन्तु बहुजन समाज को यह मूल्यांकन करना चाहिए कि यद्यपि वर्तमान में भाजपा संविधान को उपेक्षित कर रही है, तथापि इसकी नींव तो कांग्रेस ने ही रखी थी। ये दोनों चर्चित खेमे प्रायः एक-दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं, किन्तु यदि इनके नीतियों, संगठन संरचना, संविधान और लोकतंत्र के प्रति इनकी निष्ठा का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो ये दोनों खेमे एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी न होकर परस्पर पूरक हैं। यही कारण रहा कि मान्यवर कांशीराम और बहनजी ने शोषित समाज को सचेत करते हुए बारम्बार रेखांकित किया कि—‘कांग्रेस सांपनाथ है तो भाजपा नागनाथ है।’ साथ ही, इनके वैचारिक पदचिह्नों पर चलने वाली समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रीय जनता दल (राजद), जनता दल (यूनाइटेड) (जदयू), तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), आम आदमी पार्टी (आप) इत्यादि इनके लिए साम्प्रदायिक वातावरण निर्मित करने वाली सहायक शक्तियाँ हैं, जिसके परिणामस्वरूप देश की शोषित और वंचित जनता को राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। फलतः शोषित समाज अपने सकारात्मक एजेण्डे से दूर भाजपा, कांग्रेस, सपा, टीएमसी, आप, राजद, जदयू इत्यादि के नकारात्मक, साम्प्रदायिक और राष्ट्रविरोधी एजेण्डों में उलझ जाता है।

ऐसी परिस्थिति में बहुजन समाज को बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का यह कथन स्मरण रखना चाहिए कि—‘संविधान कितना भी श्रेष्ठ हो, यदि उसे कार्यान्वित करने वाले लोग दुष्ट होंगे तो वह अंततः निकृष्ट सिद्ध होगा।’ वर्तमान काल यही दर्शाता है। आज संविधान संकट में नहीं है, अपितु उसे कार्यान्वित करने वाले लोग दुष्ट हैं। किन्तु भाजपा के विरुद्ध कांग्रेस, सपा, राजद इत्यादि, जिन्हें जनता संविधान की रक्षा हेतु समर्थन दे रही है, क्या इनहोंने कभी संविधान का ध्यान रखा? यह प्रश्न जनता को स्वयं से पूछना चाहिए।

भारत की संवैधानिक और लोकतांत्रिक जड़ों को सुदृढ़ करने तथा नागरिक गतिशीलता को त्वरित गति प्रदान करने के लिए ही राष्ट्र निर्माता बाबासाहेब अम्बेडकर के परिनिर्वाण के पश्चात् मान्यवर कांशीराम और बहनजी ने संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित आत्मनिर्भर बहुजन आंदोलन का शुभारम्भ किया। इस आंदोलन के अपने नायक-नायिकाएँ हैं, अम्बेडकरी वैचारिकी, अपना एजेण्डा, अपने नारे, अपना इतिहास और अपनी संस्कृति है, जिसके प्रति निष्ठावान और स्ववित्त पोषित आत्मनिर्भर संगठन विद्यमान है। जनता को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वह मान्यवर साहेब के सिद्धांतों और सूत्रों पर संघर्षरत आत्मनिर्भर राजनैतिक अस्मिता को बुलंद करने वाली बसपा के साथ संनाद्ध है?

वास्तव में, संविधान अथवा लोकतंत्र संकट में नहीं है, अपितु जनता ने अपने मताधिकार का निरंतर दुरुपयोग किया है। जनता अपने ‘सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति’ के एजेण्डे से विमुख होकर प्रतिक्रियावादी बन गई है और दुष्ट लोगों के हाथों में सत्ता की बागडोर सौंप दी है। अतएव भारत को वर्तमान तानाशाही, अराजकता और साम्प्रदायिक वातावरण में जीवनयापन करना पड़ रहा है।

इस संदर्भ में विधानसभा आमचुनाव-2022 के दौरान जब पत्रकारों ने बहनजी से पूछा कि संविधान और लोकतंत्र संकट में है, तो बहनजी ने पूर्ण स्पष्टता के साथ उत्तर दिया कि—‘अपने मत का समुचित उपयोग कीजिए, अपनी (बसपा) सरकार बना लीजिए, संविधान भी सुरक्षित हो जाएगा और लोकतंत्र भी।’ नकारात्मक एजेण्डों में उलझकर अथवा प्रतिक्रिया देकर शासन स्थापित नहीं किया जा सकता। ‘सकारात्मक एजेण्डा’ ही आपकी अपनी शर्तों पर आपकी अपनी सरकार स्थापित कर सकता है।

यदि आज के हालात परिवर्तित करने हैं, शांति और सौहार्द का वातावरण स्थापित करना है, तो अपने मत का समुचित उपयोग करना होगा। ‘संविधान को एजेण्डा’ मानकर कार्य करने वाली बसपा को चुनना होगा। अतः किसी भी प्रकार से भ्रमित होने के बजाय अपने मत का समुचित उपयोग कर अपनी (बसपा) सरकार बनाकर संविधान और लोकतंत्र को सुरक्षित किया जा सकता है, भारत के राष्ट्र निर्माण की गति को त्वरित किया जा सकता है।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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