आखिर विपक्ष क्यों महामूर्ख और जातिवादी है?

#1. 2018 में जब कर्नाटका विधानसभा का इलेक्शन हुआ JDS बहुमत में नहीं आने के बाद भी बसपा सहित कई दलों ने कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत की उसमे ममता बनर्जी सहित सभी विपक्षी दलों ने कुमार स्वामी का समर्थन किया. फिर लगा कि विपक्ष इस बार बीजेपी को पटखनी दे दे अब उनको एक सर्वमान्य नेता की जरूरत थी.

#2. श्रीमती सोनिया गांधी जी ने बहन कुमारी मायावती जी का हाथ उठाते हुए जनता के सामने उस ऐतिहासिक पल को साझा किया कि अब भविष्य में विपक्ष की नेता मायावती जी है.

#3. बाकी सभी दलों को यह नागवार गुजरा और वहीं से ममता बनर्जी के अंदर बहन जी के प्रति एक टीस पैदा हो गई. और यहीं से अपनी जातिवादी मानसिकता के कारण विपक्ष बिखर गया जिससे कि मुस्लिम समाज को एक बहुत बड़ा नुकसान हुआ और 2019 में फिर से भाजपा समर्थित श्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनी गई देखा जाए तो इसमें कांग्रेस से भी ज्यादा दोषी श्रीमती ममता बनर्जी और श्री शरद पवार है.

#4. एक महिला होने के नाते बहन जी ने हमेशा ममता बनर्जी का सम्मान और समर्थन किया है.

#5. दूसरी ओर ममता बनर्जी अपनी जातिवादी मानसिकता की वजह से कभी भी दलित और पिछड़ों का सम्मान नहीं की और ना ही उनकी सरकार में यह वर्ग सुरक्षित है.

#6. 2022 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने बिना मतलब के ही समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का समर्थन किया उनके समर्थन में यहां रैली की जबकि उनको एक महिला होने के नाते बहन जी पर भरोसा जताना चाहिए था.

#7. ममता बनर्जी को लगा कि विपक्ष कहीं बसपा के प्रभाव में आकर किसी मुसलमान या पिछड़े वर्ग के व्यक्ति को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित न कर दे इसलिए बसपा को विपक्ष की महत्वपूर्ण मीटिंग में ही आमंत्रित नहीं किया l और जल्दबाजी में भाजपा से ही आए हुए RSS के कैडर के व्यक्ति को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया.

#8. दरअसल ममता बनर्जी इस बात से डरी हुई है कि एनडीए की खाली हुऐ इस स्पेस को कहीं मायावती जी अपने कुशल नेतृत्व से अपने कब्जे में ना कर ले जो उन्होंने 2018 में कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष की एकजुटता के साथ करके दिखाया था.

आज दलितों पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की सबसे बड़ी हितेषी नेता बहन मायावती जी ने एक आदिवासी को राष्ट्रपति बनाने के लिए अपना पूर्ण समर्थन देकर यह बता दिया है कि बीएसपी किसी की पिछ लग्गू पार्टी नहीं है वह स्वतंत्र है और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर बाबा साहब अंबेडकर की विचारधारा के प्रति अडिग है.

(लेखक: देशराज सक्करवाल, ये लेखक के निजी विचार हैं)

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