एन दिलबाग सिंह का कॉलम: समाजवाद का भविष्य

यादव जी को समाजवाद समझाते हुए जो चार लाइने किसी ने लिखी तो मियाँ जी को समझ ही नही आया कि आँखे दिखाएँ या मुस्कराएं. जवाब कुछ इस प्रकार था कि जब 1989 में बसपा का उदय हुआ तब बीजेपी यूपी में 30% प्लस के आसपास वोट लेती थी. सपा-बसपा गठबंधन ने 1993 में राममंदिर लहर के बावजूद सत्ता छीनकर मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया था. यादवों को गुंडागर्दी का और खुद को क्षत्रिय साबित करने का चस्का लग चुका था. गुंडागर्दी के लिए दलितों से अच्छा शिकार तो किसी को मिलता ही नही, इनको भी नही मिला.

मान्यवर साहेब ने मुलायम सिंह को सरकार से समर्थन वापिस लेकर दोबारा चुनाव करने की बार-बार चेतावनी दी लेकिन, उन पर कोई खास फर्क ही नही पड़ा. भाजपा ने इनके आंतरिक खटास को पहचानकर खुद सरकार बनाने के सपने पालने शुरू कर दिये.  लेकिन, अंतत: मजबूर होकर बसपा का मुख्यमंत्री बनाना पड़ा. कांशीराम साहेब ने एक तेजतर्रार लगभग 40 वर्षीय चट्टान के इरादों से मजबूत इरादों वाली महिला नेता मायावती जी को मुख्यमंत्री बनवाया. जब 1995 में बसपा की बहनजी की पहली बार 4.5 महीने की सरकार आई तब सरकार गिरने से पहले 1.5 लाख गुंडे जेल मे भर चुकी थी. गुंडो को अपनी औकात पता लग गई थी और बहनजी के सत्ता में आने पर दलित शोषित समाज को अपनी वोटों की कीमत का अंदाज होना शुरू हो गया था.

तब 1995 से लेकर 2012 के चुनावों तक यूपी से भाजपा घटती रही और बसपा वोटों के मामले में सीटे ऊपर नीचे होते हुए बढ़ती रही. 2012 विधानसभा चुनावों में भाजपा 14 फीसदी पर आ चुकी थी. फिर अखिलेश यादव सरकार की विफलता के कारण मुजफ्फरनगर शामली दंगों में लोगों को एक साल टैंटों में रखवाकर, समय पर दंगे कंट्रोल न करके 2014 में भाजपा के लिए ऐसी बिसात बिछवाई की 14 फीसदी वाले 41 फीसदी से ज्यादा वोट ला रहे हैं. एकतरफा सांसद जीत रहे हैं, युपी मे सरकार बना रहे हैं और फिर भी कुछ यादवों और मुस्लिम समाज के लोगों को लग रहा है कि बसपा ही भाजपा की बी टीम है. जबकि अखिलेश यादव का आधा परिवार बीजेपी समर्थक है, फिर यादव बाहुल्य बूथों पर भाजपा को एकतरफा वोट बीजेपी को जाये तो हो हल्ला भी करते हो.

काहे इतने स्याणे बने फिर रहे हो मित्रों, खुलकर बोलो ना कि हिन्दुत्व के आगे समाजवाद खत्म हो चुका है. 2022 चुनावों में अम्बेड़करवाद को पीछे रखकर भी तुम्हारे समाजवाद को हवा भरने की कोशिश की लेकिन वो अखिलेश यादव के यादववाद और परिवारवाद के सामने दम तोड़ गया.

दलितों का क्या है, इन्होने तो सदियों से संघर्ष और गुलामी की है, उनमे से आज भी कुछ स्वाभिमानी लोग संघर्ष कर रहे हैं और कुछ लोग आदतन गुलामी कर रहे हैं. लेकिन, दलितों में गुलामी करने वाले भी अब अम्बेड़करवाद में आत्मसम्मान ढूँढ़ने लगे हैं. ये सोचों कि मुस्लिम समाज ये तुम्हारा यादववाद कब तक समाजवाद के नाम पर अपनी कमर पर ढ़ोते रहकर मुस्कुराते रहेंगे जिस दिन इनकी आँख खुली, समाजवाद भी रालोद के जाटवाद की तरह 2-3 फीसदी वोटों में सिकुड़ना तय है.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह; ये लेखक अपने विचार हैं)

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